Thursday, September 15, 2011

अरे मन ! सुन गुरु-तत्व-विचार |
‘गुं रौतीति गुरु:, व्युत्पतिहिँ, गुरु मेटत अँधियार |
यध्यपि गुरु-गोविंद दोउ इक, कह वेदादि पुकार |
दोउन महँ कोउ मिलइ मिलइ तब, प्रेम-सुधा-रससार |
तदपि रहस्य सुनहु मन ! गुरु बिन, मिलइ न नंदकुमार |
... पै ‘कृपालु’ बिनु हरिहिँ मिलइ गुरु, जय सद्गुरु सरकार ||



भावार्थ- एक तत्वज्ञ अपने मन से कहता है कि हे मन ! सद्गुरु तत्व का महत्व सुन ! जो अज्ञानान्धकार को मिटा दे वही गुरु है | यध्यपि वेदादि के अनुसार गुरु एवं हरि दोनों एक ही हैं एवं इन दोनों में कोई भी कृपा कर दे तो प्रेम सुधा रस मिल जाता है | फिर भी एक रहस्य है, वह यह कि बिना गुरु के हरि की प्राप्ति असम्भव है, ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जबकि बिना हरि के ही गुरु की प्राप्ति एवं प्रेमानन्द की प्राप्ति सम्भव है | ऐसे सद्गुरु को बार-बार नमस्कार हो |


(प्रेम रस मदिरा सद्गुरु-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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