Tuesday, April 25, 2017

प्रश्न: महाराजजी! कभी कभी ऐसा होता है न एक बार मैंने ऐसे ही suit डाला हुआ था तो कोई आई और कहती है - मालकिन किधर है? तो मुझे लगा- मैं नौकरानी हूँ क्या?
उत्तर: श्री महाराजजी बोले! नौकर तो हो ही हो। भगवान के नौकर हो माया के नौकर हो। दो में से एक का नौकर बनना पड़ेगा सबको। यही तो बात है न अहंकार की। उसने जब कहा मालकिन कहाँ है तो धक्का लगा तुमको। इसका मतलब तुम अपने को मालकिन समझती हो। काहे की मालकिन हो? दो कौड़ी की तो हो। किस बात की मालकिन हो बताओ जरा? अरे! काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ईर्ष्या द्वेष सबकी तो मरीज़ हो,गुलाम हो। मालकिन किस बात की हो? मालिक तो एक भगवान है, महापुरुष है बस। तुम कहाँ मालकिन बनोगी? तुम तो इच्छाओं की गुलाम हो,ख़्वाहिशों की दासी हो। तो क्या गलत बोला उसने?
यह बीमारी निकाल देगा जब मनुष्य तभी वह normal होगा। वरना चाहे करोड़पति हो जाय,वह आगे ही बढ्ने की सोचेगा और हमेशा tension में रहेगा। कभी शांति नहीं मिल सकती। यह बीमारी मिटा दो। कोई किसी को कभी अच्छा नहीं कह सकता न मान सकता है चाहे वह जिस भी तरीके से रहे। तो फिर क्यों गुलामी करें हम दुनिया की अनावश्यक? हमको लोग अच्छा कहें- इस चक्कर में न पड़के अच्छा बनने के लिए चेष्टा करें।

है नहीं है, नहीं है है गोविन्द राधे ।
नहीं है नहीं है, है है बिरले बता दे ।।

'है, नहीं है' - एक तो ऐसे होते हैं | संसार के बड़े-बड़े वैभव हैं - रूप है, धन है, यश है, माँ-बाप-बेटा-बेटी सब हैं, तो उधर नहीं है । वो भगवान् की ओर नहीं चलेगा, नशे में रहता है । अरे इन सब में एक ही चीज़ हो जाये ज्यादा । बहुत पैसा हो जाये – हांह, मेरे बराबर कौन है! रूप, ब्यूटी कम्पिटीशन (beauty competition) में आ जाये – हांह, मैं ही अप्सरा हूँ! तो जिसका यहाँ पर वैभव है वो भगवान् की ओर नहीं चलता । वो 'है' इसलिये वहाँ 'नहीं है' उधर, परमार्थ ।
'नहिं कोउ अस जन्मा जग माहि, प्रभुता पाई जाहि मद नाहिं'
अरे छोटे-मोटे की कौन कहे, जब बाली को मार दिया राम ने और सुग्रीव को राजा बना दिया, तो कई महीने हो गये । राम ने कहा - लक्ष्मण क्या बात है, सुग्रीव ने सीता की खोज के लिये कुछ काम नहीं किया, वादा किया था उसने ।
उन्होनें कहा - हाँ सरकार, अच्छा जाते हैं, पूछते हैं... लक्ष्मण गये और सुग्रीव ने सत्कार किया, स्वागत किया और ज़रा गुस्से में लक्ष्मण ने कहा - अरे तुमने राम के आज्ञा का पालन नहीं किया! तो वो कहता है - कौन से राम? कौन से राम! अच्छा बताऊँ कौन से राम? तो ऐसे हाथ किया तरकश में बाण निकाल के मैं मारता हूँ तुझको अभी... मेरे भैया ने बाली को मारा, मैं तुझे मारूंगा । अरे अरे! हाँ याद आया, याद आया । ये हाल है संसार के वैभव का ।
तो 'है' जिसके पास तो 'नहीं है' - परमार्थ नहीं बना सकता ।

और 'नहीं है', तो 'है' - जिसके पास संसार नहीं है वो देखो मंदिरों में, बाबाओं के पास, सब जगह बेचारा जाता है । और नम्र भाव रहता है क्योंकि कोई सम्मान तो करता नहीं, कोई पूछता तो है ही नहीं उसको । इसलिये वो मनुष्य बना रहता है, भगवान् की ओर चलता है ।
और 'नहीं है, नहीं है' - ऐसा बहुत कम होता है । यहाँ भी कुछ नहीं है और भगवान् को भी गाली देता है – हाँ देखो तुम्हारा भगवान्.. क्या 'भगवान् भगवान्' करते हो? हमारे एक बच्चा था मर गया और पड़ोसी के सात थे, आठवाँ हो गया । ये क्या भगवान् का न्याय है? ऐसे भी इने-गिने लोग हैं । यहाँ भी नहीं है और वहाँ भी नहीं है ।
और चौथे होते हैं - 'है और है' । ये भी दुर्लभ है ....ये बड़े-बड़े उच्च कोटि के संस्कार वाले, जिन्होंने बहुत पुण्य किया है, बहुत पूर्व जन्म में भक्ति की है -
वे यहाँ भी वैभव में रहता है और वो भी, परमार्थ भी बनाते हैं । ऐसे वीर, बहादुर इने-गिने मनुष्य होते हैं । उच्च कोटि के संस्कार वाले इने-गिने । सब चीज़ हो और उसका अहंकार न हो - अरे ये सब आज है, कल नहीं रहेगा । क्या पता आज रूप का अहंकार है और कल को एक रोग हो गया कैंसर (cancer), छुट्टी । वो ब्यूटी कम्पिटीशन में आनेवाली वो अब कोई गधा भी नहीं पूछेगा । हाँ, आज वो करोड़पति है, कल को शेयर (share) डाउन (down) हो गया, गया । संसार की किसी भी चीज़ का भरोसा नहीं है । आज चार बच्चे हैं – हह, क्या शान है, बाप यों मूछ करता है । छत गिरी, सब मर गये । इस संसार में किसी चीज़ का कोई भरोसा नहीं है । बड़े-बड़े महापुरुषों का भी कितना बुरा हाल हुआ है | इतिहास भरा है ।
तो संसार में ये चार प्रकार के लोग होते हैं । दो प्रकार तो नेचुरैल (natural) है - 'है, नहीं है' और 'नहीं है, है' । और दो प्रकार के लोग बिरले होते हैं - 'नहीं है और नहीं है' और 'है और है' ।
थैंक्यू (Thank you)!!!!
.......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

चिन्तन प्रमुख है । सर्वनाश और भगवत्प्राप्ति, इन दोनों का एक सिद्धान्त है- चिन्तन । संसार का बार-बार चिन्तन किया, तो संसार मे आसक्ति हो गई । भगवान् का चिन्तन करने से भगवान् से अनुराग हो जायेगा । संसार में मन की आसक्ति बहुत गहरी है । यदि किसी के संयोग में सुख मिलता है तो उसके वियोग में दुःख मिलेगा, जितनी मात्रा में सुख मिलता है, उतनी मात्रा में वियोग होगा ॥
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में प्रथम तो वैराग्य होना कठिन है। यदि वैराग्य हो भी गया तो कर्मकाण्ड का छूटना कठिन है। यदि कर्मकाण्ड से छुटकारा मिल गया तो काम क्रोधादि से छूटकर दैवी सम्पत्ति प्राप्त करना कठिन है। यदि दैवी संपत्ति भी आ गई तो भी सदगुरु मिलना कठिन है। यदि सदगुरु भी मिल जाय तो भी उनके वाक्य में श्रद्धा होकर ज्ञान होना कठिन है। और यदि ज्ञान भी हो जाय तो भी चित्त- वृत्ति का स्थिर रहना कठिन है।
यह स्थिति तो केवल भगवत्कृपा से ही होती है, इसका कोई अन्य साधन नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी कहते हैं :--
" यह गुन साधन तें नहिं होई।
तुम्हारी कृपा पाव कोई कोई।।"

अतः विषयों से मन को हटाकर भगवत्तत्व गुरू से पूर्ण श्रद्धा के साथ समझकर उनके बताये गए मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए। तभी हमारा कल्याण होगा।
जो मनुष्य संसार को नाशवान और हरि- गुरु को सदा का साथी समझकर चलता है, वही उत्तम गति पाता है।

......श्री महाराजजी।

There were eighty eight thousand paramahamsas headed by Shaunaka, they asked Suta Ji, What is the superior path ? How can we attain our ultimate goal of Divine Bliss .Suta JI answered in a single verse "DEVOTION TO Shri Krishna is the simplest and the easiest in the age of Kali Yug. At another place in the Bhagavatam, Parikshit asked Shukadeva Paramahamsa " Please briefly instruct me as to how I can attain my goal." Shukadeva .. replied "Practice exclusive selfless devotion to Shri Krishna , abandoning all kinds of worldly desires including the desire for liberation ".... One should not be lazy in the matter of acquiring spiritual knowledge.
" Excerpt Bhagavad bhakti by ..Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.

JAI SHRI RADHEY.

Monday, April 10, 2017

दीनता भीतर रहे , और बहार से एक्टिंग में क्रोध का व्यवहार भी करना होगा ! संसार में हर तरह का व्यवहार करना होगा लेकिन भीतर गड़बड़ न हो ! भीतर दीनता , सहनशीलता , नम्रता यही गुण रहें और बाहर से जैसा व्यवहार बाहर वाला करे उसी का जवाब देना चाहिए ! अब एक बदमाश घर में घुसे और उससे तुम कह दो कि आप कैसे पधारे ? नहीं , उसकी चप्पल से पिटाई करो , लेकिन भीतर से गड़बड़ न करो ! ये मतलब है ! दीनता , नम्रता और सरे गुण अंतःकरण में रहने चाहिये और संसार के व्यवहार में सब तरह का व्यवहार करना चाहिए ! जैसा पात्र हो वैसा व्यवहार करो ! बच्चे का सुधार करना है , उसको डाँटना है , गुस्से की एक्टिंग करो , गुस्सा न करो ! भीतर गड़बड़ न करो , बाहर से गड़बड़ की एक्टिंग करो ! इतने मर्डर किये अर्जुन ने , हनुमान जी ने , प्रह्लाद वगैरह ने , भीतर गड़बड़ नहीं हुआ बाहर से सब एक्टिंग हो रही है ! पिक्चर में जैसे प्यार की एक्टिंग करते हैं , दुश्मनी की एक्टिंग करते हैं , मारधाड़ करते हैं , वैसे ही मुँह बनाते हैं ! लेकिन भीतर नहीं ! वो तो पैसा कमाने को एक्टिंग कर रहे हैं ऐसे ही हमको बाहर से व्यवहार करना है अनेक प्रकार का लेकिन भीतर नार्मल रहें !
**********जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज**********
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से:
जब लोग चिपटतें हैं किसी से, बड़ा पैसा है तो जबरदस्ती के रिश्तेदार बन जाते हैं लोग। ये पैसे वाला है लगो इसके पीछे,मरेगा तो मिलेगा हमको और जब पैसा नहीं है सगे बाप को,सगी माँ को,सगे बेटे को लोग छोड़ देते हैं। अरे कुछ नहीं है उसके पास। वहाँ क्या जाते हो? जब पेड़ में फल लगे हैं,तो पक्षी अपने आप आते हैं बिना बुलाये, और चहचहाते हैं,फल खाते हैं, फल झड़ गये, मौसम समाप्त हो गया फल का,पक्षी उड़ गये और वृक्ष बुलावे तो भी नहीं आता कोई पक्षी। ऐसा ये संसार है। जहाँ स्वार्थ सिद्धि है वही बाप है,वही माँ है,वही बेटा है। स्वार्थ हल नहीं हुआ तो नमस्ते। कोई किसी को नहीं पूछता फिर भी हम नहीं समझते। और भगवान को अपना माँ,बाप,बेटा, पति नहीं मानते संसार में ही मर रहे हैं। आँख से देख रहे हैं,अनुभव कर रहे हैं ,दूसरे को भी देखते हैं अपना भी देखते हैं। और फिर भी तत्त्वज्ञान नहीं। वैराग्य नहीं। मन को जब तक ठोकर न लगे जोरदार संसार की तब तक वो भगवान की ओर नहीं चलता। या तो इतना बड़ा शास्त्र वेद का ज्ञाता तत्त्वज्ञानी हो और या तो ठोकर लगे। तभी भगवान की ओर कोई चलता है।
जितना अधिक संसार होगा ,कोई संसार हो - रूप सुंदर है उसी के पीछे पड़े हैं लोग,धन है उसी के पीछे पड़े हैं,पोस्ट है कमिश्नर है,कलेक्टर है उसी के पीछे पड़े हैं लोग,कोई चीज़ आपके पास खास हो गयी एक,बस संसार वाले आपका पीछा कर लेंगे।फिर आप भगवान् को भूल जायेंगे। असिस्टेंट भगवान बन जायेंगे। वाह! अरे क्या हो तुम तुम्हारी हैसियत क्या है न रूप में कोई कामदेव है,न धन में कोई कुबेर है, सबसे बड़ा पैसे वाला 7 अरब आदमी में दुनिया में ,एक आदमी है बिल गेट्स उसके पास कुल 46अरब डॉलर की संपत्ति है,46 अरब डॉलर बस कुल जमा टोटल।
46 अरब डॉलर में तो एक शहर को भी नहीं कोई खरीद सकता। क्या हैसियत है उसकी? उसी में अहंकार - मैं दुनियाँ में टॉप करता हूँ। अभी हमारे देश में आये थे वो ,और बड़ा स्वागत हो रहा है। क्यों? वो दुनिया में टॉप का पैसे वाला है। 46 अरब डॉलर। तो ये छोटी छोटी चीजें हैं हमारे पास वही अहंकार पैदा कर देती हैं। अहंकार से बचना होगा।

------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
What is Karmyog?
A nurse takes care of thousands of children in a hospital over her lifetime. She feeds and cleans them, gives them medicine, etc. She performs these tasks as part of her duty and not because she is attached to them. Her love and attachment are mostly for her children and family. She does not love the babies in the hospital as much as she does her own. The sickness of her own child brings her anxiety and pain. She will do everything possible to bring her own child back to normal health at the earliest.
But if a child falls sick in the hospital, the nurse will tend to it immediately and perform her duties well. Her reaction to the sickness will be quite normal and not emotional. She is not emotionally attached to the sick child. In the same way, we have to perform our material duties without any attachment for sake of duty and not being bothered of the loss or profit. This is called as Karmyog.
~~~Jagadguru Shree Kripalu Ji maharaj~~~~
सारा संसार मायाजनित अज्ञान के द्वारा अन्धा हो रहा है परन्तु अपने को कोई भी अज्ञानी नहीं समझता सभी ज्ञानी समझते हैं।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Don't look at my fallen condition, O Radhey !

Just think about Your Greatness and have Mercy on me !


बलिहार युगल सरकार,हमरिहुँ ओर निहार।
तुम पतितन को रखवार,हम पतितन को सरदार।
तुम दीनबंधु सरकार, हम अहंकार अवतार।
तुम मम 'कृपालु' आधार, हम जानत नाहिँ गमार।।
----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

अकिंचन बन कर ; शुद्ध , सरल , निष्कपट भाव से जब साधक पुकारता है , तब वह अकारण - करुण भगवान् अपनी कृपा से उसे किसी वास्तविक महापुरुष से मिला देते हैं ।
------------जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु।

संसार के कार्य करते हुए भी बीच-बीच में बारंबार 'भगवान मेरे सामने हैं' इस प्रकार रूपध्यान द्वारा निश्चय करते रहना चाहिये। इससे दो लाभ हैं - एक तो रूपध्यान परिपक्व होगा, दूसरे हम, भगवान को अपने समक्ष, साक्षात रूप से महसूस करते हुए उच्छृंक्ल न हो सकेंगे, जिसके परिणाम स्वरूप अपराधों से बचे रहेंगे। जीव तो, किंचित भी स्वतंत्र हुआ कि बस, वह धारा-प्रवाह रूप से संसार की ही ओर भागने लगेगा।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Just like a patient trusts his doctor completely and follows his instructions to get better, a devotee should trust a Saint and His words completely to make spiritual progress. Trusting a Saint is called True Faith.And without true faith you cannot attain anything in spiritual area.
RADHEY-RADHEY.
गुरु मेटत अँधियार .....!!!
गुरु अपने अनुगत के लिए सदा कृपालु होता है,किन्तु कृष्ण प्राप्ति हेतु लालसा बनाए रखने की पात्रता अनिवार्य है। पात्रता का तात्पर्य शरणागति से है। निष्काम भाव से गुरु की शरणागति करने से वह महापुरुष अनुगत साधक के अंत:करण की भूमि को उर्वरक बना उसमें ईश्वर भक्ति का बीज बोता है। गुरु कृपा पाने की शर्त यह है की साधक की गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा एवं दृढ़ निष्ठा हो। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में उसकी गुरु भक्ति निष्कंप और निश्चल रहे। तभी शिष्य की चेतना गुरु की चेतना से एकाकार हो सकती है,उसकी वत्सलता और कृपा को अनुभूत कर सकती है। गुरु अनुगत के अंत:करण की निर्मलता को नहीं देखता बल्कि उसका समर्पण देखता है और हरी की गोद उपलब्ध करवा देता है।
गुरु माता शिशु मन गोविंद राधे। विमल बना के हरि गोद बैठा दे।।
अत: गुरु की महिमा का बखान असंभव है;शब्दातीत है।
काम ,क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या,द्वेष, अहंकार आदि मन के शत्रु घटाटोप की तरह मन को आछादित किए रहते हैं। ऐसे भीषण शत्रुओं से घिरे मन की स्थिति के प्रति उसके कृपालु मन में भाव- संवेदनाओं की अजस्र धार फूट पड़ती है और वह अपने अनुगत के अंत:करण के मल का अनवरत प्रक्षालन करता रहता है। गुरु के हर व्यवहार,हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है,भले ही वह ऊपरी तौर पर कितना भी निरर्थक क्यों न लगे। हमें उसकी किसी बात की अवहेलना नहीं करनी चाहिए,बल्कि अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए क्योंकि गुरु के रूठ जाने पर जीव के कल्याण का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। गुरु आज्ञापालन और सेवा ही जीव को ईश्वर तक पहुंचाने का मूल मंत्र है। गुरु सेवा का अर्थ है- गुरु जो भी कहे,जैसा भी काम सौंपे,करना है।

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

गुरु के ऋण से उऋण होने के लिये श्रेष्ठ शिष्य का एकमात्र कर्त्तव्य है कि विशुद्ध निष्काम भाव से गुरु चरणों में सर्वसमर्पण कर दे।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

One should not worry about his destiny or what will happen in his lifetime, because what is ordain will happen anyways...We should strive to do devotional service to purify our minds so that we can be happy in any kind of condition of life...A mayik mind keeps us running after worldly joys and in the end the ultimate result is birth and death and a pure mind will desire higher taste and attain the kingdom of God...Every day of our life we should make special effort to bathe the mind the the realm of God always remembering that He give us this human body to know and love Him.
Radhey- Radhey.

जब आज को कल पर टालते ही रहोगे तो उम्र चाहे जितनी हो कभी भगवत भजन प्रारम्भ नही कर सकोगे। बुढापे मे तो अपना शरीर ही सम्भालना मुश्किल हो जाता है। भजन एवं सेवा क्या करोगे ? अगर तुम्हारा भगवतप्राप्ति, भगवत प्रेम ही लक्ष्य है तो फिर देर किस बात की? किसका इन्तजार है? करुणानिधि के समक्ष दीन बनकर एक बार केवल एक बार सच्चे हृदय से कहकर तो देखो। वे सब कुछ दे देंगे।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मिलत नहिं नर तनु बारम्बार |
कबहुँक करि करुणा करुणाकर, दे नृदेह संसार |
उलटो टाँगि बाँधि मुख गर्भहिं, समुझायेहु जग सार |
दीन ज्ञान जब कीन प्रतिज्ञा, भजिहौं नंदकुमार |
भूलि गयो सो दशा भई पुनि, ज्यों रहि गर्भ मझार |
यह ‘कृपालु’ नर तनु सुरदुर्लभ, सुमिरु श्याम सरकार ||

भावार्थ – यह मनुष्य का शरीर बार – बार नहीं मिलता | दयामय भगवान् चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं | मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टाँग कर मुख तक बाँध देते हैं | जब गर्भ में बालक के लिए कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से बाहर निकाल दीजिये, मैं केवल आपका ही भजन करूँगा | जन्म के पश्चात् जो श्यामसुन्दर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, इसीलिये सावधान हो कर श्यामसुन्दर का स्मरण करो |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
Shri Maharaj ji's Golden words:
Not even 6 people out of 6 Billion People in this world know what Sin (पाप) is. The time we spend in Remembering Lord KRISHNA and the time we spend in association with Mahapurush (Guru) is the Only Time we Do not commit Sin(पाप). All the remaining time we commit Sin (पाप) Only.

कबीर जी कहते हैं:-
तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।

यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये। इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं, ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर पहुँच नहीं सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल पर पहुँचोगे।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।

माय ! अस गुड़िया मोहिं बनाय |
जाकी निरखि सुघर सुंदरता, गुड़रा जिय ललचाय |
भूषन – वसन पिन्हाउ वाय अस, जस कहुँ सखिन न पाय |
पुनि बनाउ अस सुंदर गुड़रा, लखि गुड़िया मनभाय |
नख शिख करि श्रृंगार दुहुँन सिर, सेहरा देउ बँधाय |
कह ‘कृपालु’ तब कुंवरि सखिन लै, दोउन ब्यावहु कराय ||

भावार्थ – छोटी सी किशोरी जी कीर्ति मैया से कहती हैं – “ मैया ! मुझे ऐसी बढ़िया गुड़िया बना दे जिसकी सुन्दरता देख कर गुड्डे का मन ललचा जाय | और मैया ! इस गुड़िया को ऐसे कपड़े एवं गहने पहिना दे जो सखियों को कहीं न मिलें | फिर मैया गुड्डा भी इतना ही सुन्दर बना दे कि उसे देखकर गुड़िया का मन ललचा जाय | दोनों का नख से शिख तक सुन्दर श्रृंगार करके, दोनों को सेहरा बाँध दे |” ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – “हाँ मैया ! ऐसा कर दे, तब हमारी छोटी – सी किशोरी जी सखियों को लेकर गुड़िया – गुड्डा का ब्याह रचायेंगी |”
( प्रेम रस मदिरा श्री राधा – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

नींद जो है वो तमोगुण है। जाग्रत अवस्था में हम सत्वगुण में जा सकते हैं,रजोगुण में भी जा सकते हैं। लेकिन नींद जो है वो प्योर(pure) तमोगुण है। बहुत ही हानिकारक है। अगर लिमिट से अधिक सोओ तो भी शारीरिक हानी होती है। आपके शरीर के जो पार्ट्स हैं उनको खराब करेगा वो अधिक सोना भी। रेस्ट की भी लिमिट है। रेस्ट के बाद व्यायाम आवश्यक है। देखिये शरीर ऐसा बनाया गया है कि इसमें दोनों आवश्यक हैं। तुम्हें संसार में कोई जरूरी काम आ जाए,या कोई तुम्हारा प्रिय मिले तब नींद नहीं आती। इसलिए कोई फ़िज़िकल रीज़न नहीं कारण केवल मानसिक वीकनेस है। लापरवाही,काम न होना,नींद आने का प्रमुख कारण है। हर क्षण यही सोचो की अगला क्षण मिले न मिले अतएव भगवद विषय में उधार न करो।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

यदि आपके पास श्रद्धा रूपी पात्र है तो शीघ्र लेकर आइये और पात्रानुसार कृपालु महाप्रभु रूपी जलनिधि से भक्ति-जल भर-भरकर ले जाइए।स्वयं तृप्त होइये और अन्य की पिपासा को भी शांत कीजिये ।
यदि श्रद्धा रूपी पात्र भी नहीं है तो अपने परम जिज्ञासा रूपी पात्र से ही उस कृपालु-पयोधि का रसपान कर आनंदित हो जाइये ।
यदि जिज्ञासा भी नहीं है तो भी निराश न हों । केवल कृपालु-महोदधि के तट पर आकार बैठ जाइये, वह स्वयं अपनी उत्तुंग तरंगों से आपको सराबोर कर देगा । उससे आपमें जिज्ञासा का सृजन भी होगा, श्रद्धा भी उत्पन्न होगी और अन्तःकरण की शुद्धि भी होगी । तब उस शुद्ध अन्तःकरण रूपी पात्र में वह प्रेमदान भी कर देगा ।
और यदि उस कृपासागर के तट तक पहुँचने की भी आपकी परिस्थिति नहीं है तो आप उन कृपासिंधु को ही अपने ह्रदय प्रांगण में बिठा लीजिये । केवल उन्हीं का चिंतन, मनन और निदिध्यासन कीजिये । बस! आप जहां जाना चाहते हैं, पहुँच जाएँगे, जो पाना चाहते हैं पा जाएँगे ।

।। कृपानिधान श्रीमद सद्गुरु सरकार की जय ।।

सौ बातन की इक , धरु मरलीधर ध्यान।
बड़वहु सेवा -वासना , यह सौ ज्ञानन ज्ञान।।७४।।

भावार्थ - अनंत सिद्धांतों का यही सार है कि सेव्य श्रीकृष्ण में मन का अनुराग हो। एवं श्रीकृष्ण सेवा की भावना निरंतर बढ़ती जाय। यही अंतिम तत्त्वज्ञान है।
भक्ति शतक (दोहा - 74)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

Thursday, March 16, 2017

ओरे मोरे मन, राधिका रमन, निशि दिन गुन गन गाये जा। छिन छिन नेह बढ़ाये जा। पल पल प्रेम बढ़ाये जा।
वह जीवन क्या जीवन जिसमें , जीवन धन से प्यार न हो, है वह प्यार, प्यार क्या जिसमें ,पियसुख में बलिहार न हो।
श्यामा श्याम मिलन हित, नित प्रति,नैनन नीर बहाये जा। मन गोविंद गुन गाये जा।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

श्री राधे हमारी सरकार, फ़िकिर मोहिं काहे की ।

हित अधम उधारन देह धरेँ, बिनु कारन दीनन नेह करेँ ;

जब ऐसी दया दरबार , फ़िकिर मोहिं काहे की ।

...........श्री महाराज जी।

अनादिकाल से साधना की असफलता के पीछे एक ही अवगुण रहा है...!
हरि गुरु का स्मरण त्याग कर मन संसार में लगाना।
.......श्री महाराज जी।

मेरी स्वामिनी श्यामा प्यारी,यह जीवन उन पर वारी।
मेरी स्वामिनी अस रस वारी,लखि रसिक शिरोमणि वारी।
मेरी अस वृषभानुदुलारी, रह चाकर बनि बनवारी।
मेरी प्यारिहिं लखत बिहारी,भूलत भगवत्ता सारी।
मेरी स्वामिनी लखि अस वारी,हरि कह जय जय बलिहारी।।
------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

भगवान् तथा महापुरुष शुद्ध शक्ति हैं। महापुरुष का संग सांसारिक हानि सहकर भी करना श्रेयस्कर है। महापुरुष भले ही प्रेमयुक्त व्यवहार करें , उदासीन रहें अथवा विपरीत व्यवहार ही क्यों न करें । सबमें हमारा कल्याण है।
--------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


Sunday, March 5, 2017

ये संसार सारहीन है इसमें इतना ही सार है कि मानव शरीर पा कर हरि एवं गुरु से सच्चा प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो जाय।
.......श्री महाराज जी।


श्री महाराजजी के श्रीमुख से......!!!
1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।
2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।
4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।
5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।
6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।
7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।
8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात है बड़ी इंपोर्टेंट(IMPORTANT)। हरि- गुरु को अपने साथ सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट। अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।

कामना करना हमारा स्वभाव है:
आनन्द पाना हमारा स्वभाव है, इसलिये कामना बनाना भी हमारा स्वभाव है । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन्हीं की पाँच कामना होती है अर्थात् देखने, सुनने, सुँघने, रस लेने, और स्पर्श करने की कामना । अज्ञानी संसार की कामना करता है और ज्ञानी भगवान् की कामना करता है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


आज्ञापालन ही अंतिम लक्ष्य है और प्रारम्भिक लक्ष्य है,और बीच में भी यही चलेगा। इसलिए सेवा को अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिये कि जिससे हमारे स्वामी को सुख मिले,वही क्रिया हमारे लिए कल्याणकृत है, हमारे सोचने के अनुसार नहीं। हमारी बुद्धि कभी वहाँ तक नहीं सोच सकती जहां तक हमारा स्वामी सोचता है। आज्ञापालन तो बहुत से लोग करते हैं ,लेकिन विपरीत चिंतन करके आज्ञापालन,हमको ऐसा कह दिया,करना तो पड़ेगा ही अब कह रहे हैं तो ,ये भीतर सोचा और गए ,गिर गए। अरे! मैंने कुछ कहा थोड़े ही॥ अरे! सोचा न ,भगवान के यहाँ कहने वहने का मूल्य नहीं हैं बस सोचने का मूल्य है , मन से चिंतन,इसलिए बहुत सावधान होकर हमें इस एक सेंटेन्स(sentence) पर बुद्धि को केन्द्रित करना है। सेवा पर। जिस आदेश से उनको सुख मिले बस वही सही है,हमारा ख्याल। फिर हमारा ख्याल लगाया तुमने ,फिर बुद्धि की शरणागति कहाँ है तुम्हारी । तुम गुरु की आज्ञा कहाँ मान रहे हो,ये तो अपनी आज्ञा मान रहे हो तुम! अत: क्षण-क्षण सावधान रहो और गुरु आज्ञा को ही सर्वोपरि मानो। अपनी दो अंगुल की खोपड़ी लगाना बंद करो,इसी ने तुम्हारे अनंत जन्म बिगाड़े हैं।
.......सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मोर मुकुट वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
भाल तिलक वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
मुदु मुसकनि वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
दृग अति मतवारो ,मेरो प्रानन प्यारो।
....श्री महाराजजी।
ओरे मोरे मन, राधिका रमन, निशि दिन गुन गन गाये जा। छिन छिन नेह बढ़ाये जा। पल पल प्रेम बढ़ाये जा।
वह जीवन क्या जीवन जिसमें , जीवन धन से प्यार न हो, है वह प्यार, प्यार क्या जिसमें ,पियसुख में बलिहार न हो।
श्यामा श्याम मिलन हित, नित प्रति,नैनन नीर बहाये जा। मन गोविंद गुन गाये जा।

----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


अब देखो यहाँ चार-पाँच सौ आदमी आये हैं | अब अगर एक आदमी सोचे- हमसे तो बात ही नहीं किया | भई कोई संसारी व्यवहार हो कि चलो एक-एक आदमी को नम्बर-वार बुलाओ और एक-एक आदमी से बात करो, ऐसा तो नहीं | और जिससे बात करेंगे उससे अधिक प्यार है, ये सोचना गलत है | मेरी गोद में कोई बैठा रहे 24 घण्टे इससे कुछ नहीं होगा | उसका मन जितनी देर मेरे पास रहेगा बस उसको हम नोट करते हैं | खुले आम सही बात करते हैं | बदनाम हैं सारे विश्व में हम स्पष्ट व्यक्तित्व में साफ-साफ | आप ये ना सोचें कि हम बहिरंग अधिक सम्पर्क पा करके और बड़े भाग्यशाली हो गए | और एक को बहिरंग सम्पर्क न मिला, उससे बात तक नहीं किया मैंने तो उसका कोई मूल्य नहीं है हमारे हृदय में | ये सब कुछ नहीं | कुछ लोगों की आदत होती है बहुत बोलने की | वो जैसे ही लैक्चर से उतरेंगे सीधे हमारे पास आएंगे और बकर-बकर बोलते जाएंगे | कुछ लोग अपना हृदय में ही भाव रखते हैं, दूर से ही अपना आगे बढ़ते जाते हैं | मैं तो केवल हृदय को देखता हूँ | मुझे इन बहिरंग बातों से कोई मतलब नहीं है | और कभी बहिरंग बातों के धोखे में आना भी मत | इतना कानून याद रखना- “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम” | जितनी मात्रा में हमारा सरेण्डर होगा, हमारी शरणागति होगी उतनी मात्रा में ही उधर से फल मिलेगा |
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
बहुतों को शंका है की भगवान और गुरु हमसे कितना प्यार करते हैं या कितना कृपा करते हैं ? तो इसका सीधा और सरल उतर है कि जो जीव जितनी मात्रा में जितना प्यार (भक्ति) करेगा, उससे भगवान और गुरु उतना ही प्यार करेंगे उससे अधिक भी नहीं या उससे कम भी नहीं । अब आप लोग सोचो आपको कितना चाहिए । आपको यदि १०% चाहिये तो १०% कर लो यदि ५०% चाहिये तो ५०% कर लो यदि हाँ १००% चाहिये पूरा कर लो । इसलिये प्यार करोगे तो प्यार मिलेगा यदि अक्टिंग करोगे तो वो भी महा अक्टिंग करेंगे । इसलिये छल, कपट छोड़ कर निस्वार्थ भाव से तुरंत जन्मे हुये बच्चे की तरह रो कर पुकारो ओर प्यार (भक्ति) करो ।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
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Out of 8,400,000 varieties of living beings, humans are the only children of God who have been granted the privilege of performing fruit-bearing actions. Since you cannot undo what you have done already, stop crying over destiny and focus instead on the actions you are free to perform in this life, for they will be called your destiny in the future. You have tremendous power. All other creatures, including heavenly gods, envy what you have: the power to create your own destiny.
------Jagadguru Shree Kripalu Ji Maharaj.
सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना हरि-गुरु सेवा के नष्ट न होने पाये। अपने आपको अपने शरण्य की धरोहर मानकर उनकी नित्य सेवा करने में ही अपना भूरिभाग्य मानो।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।