Wednesday, October 11, 2017

प्रारब्ध क्या होता है?
भगवान् हमारे अनंत पुण्य व अनंत पापों में से थोडा-थोडा लेकर हमारे किसी एक जन्म का प्रारब्ध तैयार करते हैं और मानव जीवन के रूप में हमें एक अवसर देते हैं ताकि हम अपने आनंद प्राप्ति के परम चरम लक्ष्य को पा लें।
प्रारब्ध सबको भोगना पड़ता है।
भगवद् प्राप्ति के बाद जब कोई जीव महापुरुष बन जाता है,
तब भगवान् उसके तमाम पिछले जन्मों के एवं उस जन्म के भी समस्त पाप-पुण्यों तो भस्म कर देते हैं, लेकिन वे उसके उस जीवन के शेष बचे हुए प्रारब्ध में कोई छेड़छाड़ नहीं करते।
इसका अभिप्राय यह है कि भगवान् को पा चुके मुक्त आत्मा संतों/भक्तों को भी अपना उस जन्म का पूरा प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है।
उसमें इतना अंतर अवश्य आ जाता है कि अब वह नित्य आनंद में लीन रहने से किसी सुख-दुःख की फ़ीलिंग नहीं करता। लेकिन फिर भी एक्टिंग में उसे सब भोगना पड़ता है।

किसी के प्रारब्ध को मिटाना भगवान् के कानून में नहीं है।
वे लोग बहुत भोले हैं, जो यह समझते हैं कि अमुक देवी जी, अमुक बाबा जी अपनी कृपा से मेरे कष्ट को दूर कर देंगे। या मुझे धन, वैभव, पुत्र आदि दे देंगे।
जो प्रारब्ध में लिखा होगा, वह नित्य भगवान् को गालियाँ देने से भी अवश्य मिलेगा।
जो प्रारब्ध में नहीं लिखा होगा, वह दिन-रात पूजा पाठ करने से भी न मिलेगा।

भगवान् की भक्ति करने से संसारी सामान नहीं मिला करता, जीव के प्रारब्ध जन्य दुःख दूर नहीं होते, बल्कि भक्ति से तो स्वयं भगवान् की ही प्राप्ति हुआ करती है।
यह बात अलग है कि कोई मूर्ख अपनी भक्ति से भगवान् को पा लेने पर भी वरदान के रूप में उनसे उन्हीं को न माँगकर संसार ही माँग बैठे।
यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि जिसको भगवान् की प्राप्ति हो चुकी, उसके लिए प्रारब्ध के सुख-दुःख खिलवाड़ मात्र रह जाते हैं।
...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

एक साधक का प्रश्न :- भगवान् का चिन्तन कैसे होगा ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- भगवान् का चिन्तन होता नहीं है , करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन हो रहा है। संसार का चिन्तन बिना किये हो जाता है क्योंकि पहले का हमारा अभ्यास है। अब यदि भगवान् का चिन्तन करना है तो उसका अभ्यास प्रारंभ करना होगा। अभ्यास द्वारा वह भी होने लगेगा।

O mind! Absorb yourself in chanting the holy name of 'Shri RadhaRani'. This human body is short-lived and can be snatched away at any moment.
----- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.

तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
****जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु ****

People just lie that God fulfils their every desire, because they ignorantly think that any benefit received as a result of one’s destiny is due to God’s grace. There is some benefit in this belief because the individual realises God’s grace on this basis. But the harmful consequence of this belief is that, when the material desires are not fulfilled, this faith in God immediately disappears.
.....SHRI MAHARAJJI.

एक साधक का प्रश्न - क्या प्रेम किसी साधना से मिल सकता है ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर : असंभव ।श्री कृष्ण का प्रेम नित्य सिद्ध है , वो साधन साध्य नहीं है । कोई भी साधन श्री कृष्ण प्रेम का मूल्य नहीं हो सकता । क्योंकि वो प्रेम तो दिव्य है जिसके स्वयं श्री कृष्ण भी आधीन रहते हैं । तो कौन साधन से कोई उसको पा लेगा ? क्योंकि साधन जो भी होगा , वो इन्द्रिय ,मन , बुद्धि से होगा अर्थात मायिक होगा । उस मायिक साधना से दिव्य वस्तु कैसे मिलेगी ? भगवान् ही नहीं , उनका दर्शन भी असंभव है फिर उनका प्रेम तो और भी अधिक मूल्यवान है।

JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ......!!!
Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj -- is considered the supreme acharya and Jagadguru of the present age. He accepts the philosophy of achintya-bhedabhed-vad, as well as the philosophy of Jeev Goswami more specifically, that is, the reconciled philosophies of all the acharyas (teachers) who teach the path of selfless bhakti for the realization of Divine love.
He has not formed his separate religion. He teaches the path of selfless bhakti to Radha Krishn which itself is the eternal single religion to experience the divine bliss of braj ras and nikunj ras of Golok and Divine Vrindaban. Maharaji Kripalu has not written a separate philosophy. He recognizes that of Jeev Goswami and says that the Bhagwatam is the complete and final scriptural authority and is the explanation of the Brahma Sutra.
He says that the desired goal of a soul is to receive the selfless and divine love of Radha Krishn, the soul of your soul. Knowing this you only have to develop a desire for this vision and love by strengthening your faith.
Keeping away from bad associations and chanting. That’s all you have to do. You just remember that Radha Krishn are truly yours and you only belong to them. They are most kind and causelessly merciful; they will do the best for you. Shree Maharajji did not relate the divine lineage of this path, like the other acharyas did, because it is directly introduced in the world by Shree Raseshwari Radha Rani and Krishn during Their descension period. It has been also taught by the rasik saints.
Shree Maharajji says simply that the ultimate goal of a soul is to receive the selfless Divine love of Radha Krishn and to serve them in Their Divine abode. This is attained through the teaching of a true rasik Saint and the complete purification of the heart through bhakti.
Maharaji Kripalu has detailed his entire philosophy of God’s bliss, God-realization and devotion in his writings that are meant to communicate with everyone, from an ordinary literate person to a highly educated scholar. He has revealed an enormous amount of devotional material through his speeches and writings, including teachings, philosophies, covering devotion, God realization and grace, saint’s grace, classes of divine bliss, and the supremacy of the Divine love of Radha Krishn. He also produces guidelines for all kinds of devotees, as well as devotional procedures, leela songs (pad), songs (pad) of humbleness, and the chants of the name, form, virtues, and the leelas of Radha Krishn.
JAI SHRI RADHEY.

अगर आपने वास्तविक गुरु को त्याग दिया,गुरु का अपमान कर दिया या गुरु के साथ छल-कपट किया तो भगवान करोड़ों कोस दूर हो जायेंगे। तुम चाहे अब दिन रात आँसू बहाओ फिर। भगवान सह नहीं सकते अपने भक्त का अपमान। सदा सावधान रहो, जैसी भक्ति भगवान की हो, ठीक वैसी ही भक्ति उनके भक्त यानि वास्तविक महापुरुष की भी करनी ही होगी।

श्री महाराजजी से प्रश्न:
साधना में ऐसा कौन सा सिद्धान्त प्रमुख है जिससे साधक जल्दी आगे बढ़ सकता है भगवान की तरफ? क्या सेवा अच्छी है या भजन कीर्तन?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:
सेवा तो अंतिम लक्ष्य है ही है। इसमें सारी इंद्रियाँ लगी रहती है। और भजन कीर्तन तो केवल मन से होता है। और भजन कीर्तन जो है उसके लिए एकांत में,अलग समय चाहिए। और सेवा तो संसार का कर्म करते हुए भी हम 24 घंटे कर सकते हैं। इसलिए सेवा का अधिक महत्व है। सेवा हरी-गुरु निमित्त हो ,शर्त ये है।

गलती न मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोग अपने को बुद्धिमान कहलाना चाहते हैं । किसी को अगर कोई मूर्ख कहे , यह किसी को बर्दाश्त नहीं होता । अगर कोई विवेकपूर्वक सोचे तो सब अल्पज्ञ ही तो हैं । सब लोगों के पास जो बुद्धि है वह काम चलाऊ ही तो है । गुरु ने भी दोष बताया तो उलटा सोचने लगा । यह प्रमुख गलती है । चाहिये तो शिष्य को यह कि अगर कोई दोष बताया जाय तो निरन्तर उसका चिन्तन करे और भविष्य में वह न होने पाये । कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते हैं , लेकिन कोशिश कम होती है अतः दोष भी कम ठीक होते हैं। बराबर वाले और बड़ों से व्यवहार करते समय अपनी वाणी पर कन्ट्रोल रखें , जवाब न दें । गुरु के प्रति तो यही सोचना काफी है कि गलती तो हमारी ही होगी ।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

माया के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाने एवं अपने को शरीर मान लेने के कारण मैं अनादिकाल से निरंतर संसार में ही अनुरक्त था ।
गुरु ने इस मोह - निद्रा से जगाकर यह ज्ञान कराया कि तेरी अंशी श्री राधा ही एक मात्र तेरी हैं ।

---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ।
व्यर्थ चिंता मत करो , तुम सिर्फ हरि-गुरु का रुपध्यान करो और रो रोकर पुकारो मैं आ जाऊंगा ।
जैसे मैंने तुम्हें इस बार ढूंढ लिया था वैसे आगे भी ढूंढ लूंगा; यह मेरा काम है आप उसकी चिंता न करें ।
तुम सिर्फ निष्काम भाव से हरि-गुरु में ही अनन्य होकर साधना करते रहो , मेरा काम मै करुंगा ही जैसे सदा करते आया हूॅ, तुम अपना काम (मेरे द्वारा दिऐ उपदेशो के अनुसार साधना) करते रहो बस !! बाकी सब मेरा काम है मैं स्वयम् कर लूंगा, दृढ़ विश्वास करके साधना-पथ पर चलते रहो ।

----- तुम्हारा 'महाराजजी' ।

जब तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ । जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का ? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्री कृष्ण दासत्व ही है । श्री कृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो । हम छूट देते हैं ।लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते। भगवत्प्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अतः सदा सावधान रहो।
---------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु।


Grace and God are one, just like the Divine Bliss and God are one. It means that God Himself is the form of Grace and God Himself is the form of the Bliss. Grace is such a power of God with which all of His absolute and unlimited virtues are revealed. It is the Grace of God that makes a Saint experience His absolute Bliss, beauty and love; and it is the same power of Grace through which a Saint imparts God realization to his disciple. God and Grace are one and the same. So wherever God is, Grace is there.
.......JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.


मन के बहकावे में न आया करो। मन ने बड़े - बड़े योगियों को बर्बाद कर दिया। अगर मन से हार मान लिया तो वह आदमी तुरन्त पागल हो सकता है, आत्महत्या भी कर सकता है।
***जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***
मन एवं सांसारिक पदार्थ सजातीय होने के कारण एक दूसरे के सहयोगी हैं।
----श्री महाराजजी।

उस ईश्वर को युगों तक परिश्रम करके भी कोई नहीं जान सकता है किंतु उस ईश्वर की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है एवं कृतार्थ हो जाता है। सर्वात्म-समर्पण से मुक्ति एवम् भगवत्कृपा का लाभ हो सकता है। हमें ईश्वर के शरणागत हो जाना है ऐसी शरणागत के आधार पर ही ईश्वर कृपा निर्भर है। जो-जो जीव आत्माएं उसके शरणागत हो गई, वह-वह अपने परम चरम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर चुकी हैं एवम् जो शरणागत नहीं हुई है उन्ही के ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं हुई है एवं वही अपने लक्ष्य से वंचित होकर 84 लाख योनियो में काल, कर्म, स्वभाव, गुणाधीन होकर चक्कर लगा रही हैं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Spend every second of your life in Meditation(Sadhana) and in service of God and Guru. You may not have today's opportunity again, you may not have human body again. Right now, you have the human body and have also found the Guru. Then why are you careless?
The golden opportunity that you have will not come again so easily, Think about it.
एक साधक का प्रशन:- भगवान् सर्वव्यापक होते हुए भी अभी तक क्यों नहीं मिले ?

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर:- तुमने चाहा नहीं ! चाहने में अनेक स्तर हैं । ऐसा चाहो कि उसके पाये बिना रहा न जाय । उससे मिले बिना एक क्षण युग के समान लगे । जैसे - जैसे व्याकुलता बढ़ेगी तुम भगवान् के पास पहुँचते जाओगे। व्याकुलता ही श्याम मिलन का आधार है । अपने को अधम पतित मान कर मनुहार करो और आँसू बहाकर भगवान् के निष्काम प्रेम कि याचना करो । संसार न माँगो। तब भगवान् महापुरुष के द्वारा अपना दिव्य स्वरूप दिखायेंगे।

कृपासिन्धु गुरुवर तो किसी से कुछ अपेक्षा ही नहीं करते वो तो पुनः-पुनः यही कहते हैं कि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो, मुझे बधाई देना चाहते हो तो एक ही प्रतिज्ञा करो-
श्यामा श्याम नाम रुप लीला गुण धामा ।
गाओ रोके रुपध्यान युक्त आठों यामा ॥

हर क्षण , हर पल, श्री महाराजजी का चिन्तन, मनन, स्मरण यही रहता है किस प्रकार कलियुग में इन जीवों का निरन्तर हरि-गुरु स्मरण हो और ये निष्काम अनन्य भक्ति द्वारा शीघ्रातिशीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।

Tuesday, September 5, 2017

अरे मूर्ख मन ! इस परम अन्तरंग तत्वज्ञान को समझ ले। तीन तत्व नित्य हैं – पहला ईश्वर, दूसरा जीव, एवं तीसरा तत्व माया । इनमें माया चिदानन्दमय ईश्वर की जड़ शक्ति है एवं जीव चिदानन्दमय ईश्वर का सनातन दास है, जिसे वेदादिकों में अंश शब्द से विहित किया गया है। जीवात्मा देही है तू उसको देह मान रहा है, बस यही अनादिकालीन तेरा अज्ञान है । जो इस बात को जितना जान लेता है, उतना ही उस पर विश्वास भी कर लेता है, उसके जानने की यही पहिचान है। पुन: जो जितनी मात्रा में उपर्युक्त बात पर विश्वास कर लेता है, उतनी ही मात्रा में अपने आप उसका श्यामसुन्दर के चरणों में अनुराग हो जाता है।‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं :- अरे मन ! अब मनमानी छोड़ दे, एवं मनमोहन में रूपध्यान द्वारा अपने आप को अनुरक्त कर ।
( प्रेम रस मदिरा: सिद्धान्त–माधुरी )
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
--- सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।

Shri Krishn does not need our service, but He kindly accepts it. When Shri Krishn asks us to surrender unto Him (Sarva-dharmaan parityajya maam ekam saranam vraja), this does not mean that Shri Krishn is lacking servants and that if we surrender He will profit. Shri Krishn can create millions of servants by His mere desire. So that is not the point. But, if we surrender to Shri Krishn, we shall be saved, for Shri Krishn says ‘aham tvaam sarva paapebhyo moksayisyami : ‘I shall free you from all sinful reactions’.
Radhey-Radhey.

हम किसी जीव को छोड़ देंगे यह कैसे संभव है । यह उस व्यक्ति विशेष की स्थिति पर निर्भर करता है। जब तक वह अलग रहेगा,तभी तक अलग रहेगा। जैसे ही अंदर से वह ठीक हो जाएगा तो 'कृपालु' को तुरंत ही ठीक हो जाना पड़ेगा,चाहे उससे पूर्व उसने अनंत अपराध किए हो।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सखी ! मैं, बिकी आजु बिनु दाम |
कियो न मोल – तोल कछु मोते, लियो मोल घनश्याम |
करि तन, मन, अरु प्रान निछावरि, भइ जग सों बेकाम |
अब सोइ नाम – रूप – गुन – लीला, सुमिरत आठों याम |
भुक्ति – मुक्ति तजि पियत प्रेम – रस, कान्त भाव निष्काम |
जाको चहत ‘कृपालु’ पिया बस, सोइ सुहागिनि बाम ||

भावार्थ – ( एक गोपी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम – मिलन एवं उसका अपनी सखी से कहना |)
अरी सखी ! आज मैं तो बिना मोल के ही बिक गई | उस प्यारे श्यामसुन्दर ने बिना कुछ मोल – तोल अर्थात् बात – चीत किये ही मुझे मोल ले लिया, अर्थात् सदा के लिए अपनी बना लिया | मैं भी तन, मन, प्राण आदि सर्वस्व देकर संसार से सदा के लिए पृथक् हो गई | अरी सखी ! अब मैं श्यामसुन्दर के नाम, रूप, गुण, लीला का निरन्तर ही स्मरण कर रही हूँ | संसार के सुख एवं मोक्ष आदि के सुख, सभी को छोड़कर कान्तभावयुक्त निष्काम – प्रेम का ही निरंतर पान कर रही हूँ | ‘श्री कृपालु जी‘ कुछ लम्बी साँसें भरते हुए कहते हैं कि जिसको पिया चाहता है वही सुहागिनी स्त्री हो सकती है अर्थात् मुझ अभागिनी के भाग्य में ऐसा विधाता ने अभी तक विधान ही नहीं रचा |

( प्रेम रस मदिरा मिलन – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

विश्व शान्ति....!!!
यदि विश्व के सभी मनुष्य श्रीकृष्ण भक्ति रूपी शस्त्र को स्वीकार कर लें, तो समस्त देशों का,समस्त प्रांतों का,समस्त नगरों का,समस्त परिवारों का झगड़ा ही समाप्त हो जाये। केवल येही मान ले कि सभी जीव, श्रीकृष्ण के पुत्र हैं। अत: परस्पर भाई भाई हैं। पुनः सभी जीवों के अंत:करण में श्रीकृष्ण बैठे हैं।
अतएव किसी के प्रति भी हेय बुद्धि,निंदनीय है। वर्तमान विश्व में इस सिद्धान्त पर किसी भी राजनीतिज्ञों का ध्यान नहीं जाता अतएव अन्य भौतिक उपायों से शांति के स्थान पर क्रांति उत्तरोतर बढ़ती जा रही है। केवल उपर्युक्त भावों के भरने से ही विश्वशान्ति संभव है।

-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

' हम ' माने जीव। इस 'हम' माने जीव के अतिरिक्त दो तत्व और हैं , एक भगवान् , एक माया। इसके अतिरिक्त और कोई तत्व नहीं है। और हमारे पास एक सामान है , जिस को हम कहीं भी लगा सकते हैं। उस सामान का नाम है , मन।
अर्थात , मन को हम चाहे भगवान् में लगा दें चाहे माया के एरिया में लगा दें। दो में एक जगह लगाना पड़ेगा।
क्यों ? इसलिए कि मन का स्वभाव है, प्रतिक्षण वर्क करना। निरंतर कर्म करना। और कर्म क्या करना ?
बिना किसी उद्देश्य के कोई कोई कर्म नहीं होता। बिना कारण के कार्य नहीं होता।
रीजन क्या ? रीजन है , आनंद।
हम आनन्द चाहते हैं , शान्ति चाहते हैं , सुख चाहते हैं , हैप्पीनेस चाहते हैं , पीस चाहते हैं। यह चाहना पड़ेगा। अगर आप कहें , हम न चाहे आनन्द , ऐसा नहीं हो सकता। क्यों ? इसलिए कि हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।
...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु ।

विश्व शांति के हेतु विश्वबंधुत्व ही आज की प्रमुख मांग है। वह केवल हिन्दू वैदिक फिलोसोफी से ही हो सकता है। 'य आत्मनि तिष्ठती' इस वैदिक सिद्धान्त के अनुसार सभी जीवों में भगवान का निवास है। यदि यह बात मानवमात्र स्वीकार करले, तो समस्त झगड़े समाप्त हो जाये और विश्वशांति का मार्ग प्रशस्त हो जाये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
वे हमें अपना बनावें चाहे न बनावें, इसकी हमें चिन्ता नहीं ।
हम सदा उन्हें अपना बनाए रहेंगे बस यही निश्चय रहे ।

------जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज।
God cannot be attained by any objective deeds, religiosity, performances of fire-sacrifices, meditation, austerity, fasting etc. God wants us to turn towards Him as we naturally are, without any make-ups....He loves us, He never leaves us and He is always ready to reciprocate our love...All we have to do is to turn our minds towards Him with favorable feelings desiring to revive our lost relation with Him......!!!
RADHEY-RADHEY.

We all devotees of Shree Maharaj ji always experience one thing that, our life was just meaningless before meeting Maharaj ji. We didn't even know the purpose of our lives. Always wandering here and there just for the satisfaction of immortal desire for happiness. We had made innumerable relationships Mother, Father, Sister, Brother etc. but none could satisfy.
Life was just stationary before Maharaj ji. Heart was just dead. Mind was tired of this world.
But after getting Maharaj ji, the seed of divine love is spurting in our hearts. This we all realize. But we must think, that we are all his souls, his children, his parts. That is why, in 7 billion people only few get this rare opportunity to be in his association. Isn't this is grace. Only by his grace we are at this stage. Always loving us. keep on gracing us every time. We have uncountable sins in backlog, lots of sinful activities on our account but in spite of our shortcomings, Maharaj ji always grace us. With even fraction of time devoted in his remembrance, he grace us with so much love.
He really loves us very much. Care for us. He is our real relative, real friend, real mother father everything. He is our true companion. We must listen to him. We must follow him. We must cry out loud and call him. He is doing so much for us. So much so much. So much for our welfare. He knows what is best for us, what is harmful for us. We must surrender ourselves to his lotus feet.

All Glories to our Divine Master Jagadguruttam Shri Kripaluji Mahaprabhu.
Radhey- Radhey.
DON'T MISS To Watch Some Special Moments 'Live on Facebook' on 9th and 10th September during Bhaktiyog Sadhna Shivir,Jaipur.
Radhey-Radhey.

नंद यशोदा वारो,मेरो प्रानन प्यारो।
वापै तन मन वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
मोर मुकुट वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
मृदु मुसकनि वारो, मेरो प्रानन प्यारो।।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
रसिक जन – धन गोवर्धन धाम |
त्रिगुणातीत दिव्य अति चिन्मय, ब्रज परिकर विश्राम |
मरकत – मणि – मंडित खंडित मद, गिरि सुमेरु अभिराम |
राधाकुंड कुसुम सर आदिक, लीलाधाम ललाम |
मर्दन – मघवा – मद मनमोहन, पूजित पूरनकाम |
सखन सनातन संग श्याम जहँ, विहरत आठों याम |
कब ‘कृपालु’ हौंहूँ बड़भागी, ह्वैहौं बसी अस ठाम ||

भावार्थ – रसिक जनों का सर्वस्व श्री गोवर्धन धाम है जो गुणों से अतीत है एवं दिव्यातिदिव्य चिन्मय तथा ब्रज के निवासियों का विश्राम स्थल है | वह गोवर्धन धाम मरकत मणियों से सुशोभित तथा सुमेरु गिरि ( पर्वत ) के भी मद को मर्दन करने वाला है | वहाँ राधाकुंड, कुसुम सरोवर आदि अनेक मनोहर लीला स्थलियाँ हैं, जो इन्द्र के अभिमान को चूर्ण करने वाला ब्रह्म श्रीकृष्ण से भी पूज्य और कामनाओं से परे हैं | इस गोवर्धन धाम में सनातन गोलोक के श्रीदामा आदि सखाओं के साथ, श्रीकृष्ण सदा ही विविध प्रकार के खेल खेला करते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि ऐसे दिव्य गोवर्धन धाम में बस कर हम कब परम भाग्यशाली बनेंगे ?
( प्रेम रस मदिरा धाम – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
उद्धव ने भगवान् से प्रश्न किया कि संसार में मूर्ख कौन है?उन्होंने कहा कि जो अपने को देह मान ले। बस इससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं। इस परिभाषा के अनुसार हम लोग क्या हैं ? अकेले में सोचना..!!!
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हम लोग छोटी सी चीज को पाने के लिये पहले सोचा,फिर प्लानिंग किया,फिर प्रैक्टिस किया,फिर भी वो काम पूरा हो न हो,डाउट है।अरे देखो चित्रकेतु के एक करोड़ स्त्रियाँ और बच्चा नहीं हुआ। तो एक स्त्री से कोई चैलेन्ज करे कि बच्चा होगा। अरे एक स्त्री से क्या चैलेन्ज कर रहे हो ? सतयुग के हैं चित्रकेतु। लेकिन भगवान् के एरिया में ये बात नहीं। भगवान् ने सोचा कि ये संसार बन गया और उन्होंने ऐसी शक्ति हमको दी है अपने आपसे मिलने के लिये कि बच्चों ! तुम भी सोचो, हम मिल जायेंगे। ऐं सोचने से मिल जाओगे ? हाँ।
मामनुस्मरतश्र्चित्तं मय्येव प्रविलीयते।
( भाग.११-१४-२७ )
केवल सोचो मन से कि वो मेरे हैं,वो मेरे हैं,वो मेरे हैं,वो मेरे अन्दर में हैं,सर्वव्यापक भी हैं,वे गोलोक में भी हैं। ये फेथ(Faith),विश्वास,इसका रिवीजन(Revision)।इसी का नाम साधना। बस सोचो।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Saturday, August 19, 2017

मन, भगवान् में लगाना है । मन गन्दा है और इसके विचार अनन्त जन्म में बिगडते-बिगडते स्वाभाविक गन्दे हो गये हैं, अतः मन को शुद्ध करना है । मन से ही अच्छे-बुरे विचार उत्पन्न होते हैं, यदि मन ने अपनी स्थिति ठीक कर ली, तो सब ठीक हो जायेगा॥
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।



Crying out For God, with the innocence of new born child, will unite with him.
------ SHRI MAHARAJJI.

"My Radha Rani abundantly bestows causeless grace upon the souls. My Radha Rani is the divine mother of the whole universe. "
---- Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj.
DON'T MISS FACEBOOK LIVE BROADCAST:
Divine Sankirtan by Sushri Shreedhari Didi (Preacher of Jagadguruttam Shri Kripalu Ji Maharaj) on Sunday, 20th August, 2017.TIME: 10 A.M.To 12 P.M.
This Satsang Program will be Broadcast 'FaceBook Live' for all Devotees around the Globe on my Timeline ( https://www.facebook.com/sharadgupta1008 ) and in your favourite Group ( https://www.facebook.com/groups/361497357281832/ ) .Video will be shared to other Groups and Pages managed by us.SO DON'T MISS THIS GOLDEN OPPURTUNITY.

Jai Shri Radhey.
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीधरी दीदी द्वारा दिव्य रसमय संकीर्तन का FaceBook पर सीधा प्रसारण दिनाँक 20अगस्त, 2017 (रविवार) को सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक किया जायेगा। इस सत्संग कार्यक्रम का आनंद आप घर बैठे ही मेरी Timeline पर ( https://www.facebook.com/sharadgupta1008 ) एवं श्री महाराजजी के दिव्य ज्ञान के प्रचार के लिये बनाये गए आपके अपने सबसे बड़े एवं प्रिय ग्रुप ( https://www.facebook.com/groups/361497357281832/ ) में 'FaceBook Live'(सीधे प्रसारण) के माध्यम से ले सकते हैं। हमारे द्वारा संचालित अन्य Groups/Pages में भी Video शेयर किया जायेगा। अतः स्वर्णिम अवसर का लाभ अवश्य उठायें,चूक न जायें।
जय श्री राधे।

साधनावस्था में कामना करने वाला घोर पतन को प्राप्त हो सकता है यानी उसका जितने पर्सेन्ट(Percent) प्रेम हुआ है श्यामसुन्दर से वह सब ज़ीरो पर आ सकता है और नास्तिक भी हो सकता है।
इसलिए कम से कम 'कृपालु' तो डंके की चोट पर कहता है:- नास्तिक बन जाओ, बने रहो ठीक है,मत जाओ श्यामसुन्दर के पास। अौर अगर जाओ तो खबरदार मोक्ष तक की कामना ले के मत जाना। कामना डेन्जरस(Dangerous) है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Sunday, August 13, 2017

सुश्री श्रीधरी दीदी के श्रीमुख से...!!!
जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा निर्मित मंदिरों का महत्त्व।
देवालय अर्थात् मंदिर, कितना पवित्र व सुखद शब्द है जिसके श्रवण मात्र से एक आध्यात्मिक वातावरण हमारे हृदयों में जीवंत हो उठता है, घंटियों की आह्लादकारी ध्वनि कर्णरंध्रों में मुखरित हो उठती है, धूप, अगरबत्ती, पुष्पों की सात्विक सुगंध नासिका में पहुँचकर बरबस हमारी चित्तवृत्ति को भी सात्विक बना देती है और प्रभु के श्री विग्रह के दर्शन पाकर मन के समस्त संताप दूर हो जाते हैं ।
जब साधारण मनुष्यों द्वारा निर्मित मंदिरों में ही जीवों को इतनी शांति प्राप्त होती है तो फिर महापुरुषों द्वारा निर्मित मंदिरों व प्रतिष्ठित विग्रहों में कैसी अद्भुत अलौकिकता व आकर्षण होगा । और फिर जिन देवालयों का निर्माण श्री राधाकृष्ण मिलित वपु श्री कृपालु महाप्रभु के संरक्षण में हुआ हो, जिन्होंने स्वयं श्री युगल विग्रहों की प्राणप्रतिष्ठा की हो उन देवालयों की महिमा क्या होगी ? इनकी महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता ।
श्री महाराज जी की दिव्य प्राकट्य स्थली में स्थित श्री भक्ति मंदिर, भक्ति महादेवी का ही मूर्त स्वरुप है। जिस भक्ति महादेवी को हम अपने हृदय में धारण करना चाहते हैं, जो भगवान को भी अपने वशीभूत करने में समर्थ हैं, वे ही भक्ति महादेवी इस मंदिर के रूप में मनगढ़ धाम में विराजित हैं जो सदा भुजायें पसारे जीवों के अपने अंक में आने की प्रतीक्षा करती रहती हैं । इस दिव्य मंदिर में भक्ति तत्व की दिव्य तरंगें सदा प्रवाहमान रहती हैं ।
और फिर गुरुधाम में तो समस्त तीर्थ समाहित होते हैं । यहाँ तक कि दिव्य गुरुधाम पर तीर्थ शिरोमणि श्री वृंदावन धाम भी न्यौछावर किया जा सकता है । ऐसी परम पावन भूमि पर यह मंदिर स्थित है । एक तो ये धाम स्वयं ही अलौकिक है, फिर इस धाम में भी हमारे गुरुवर की प्राकट्य स्थली है ये दिव्य भक्ति मंदिर । भक्ति मंदिर का गर्भ गृह ही श्री महाराज जी की प्रमुख प्राकट्य स्थली है श्री महाराज जी ने स्वयं कुछ दोहों के रूप में इसकी महिमा का दिग्दर्शन कराया है –
सेवा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
श्रद्धा रति भक्ति तीनों क्रम से दिला दे ॥
हमारे शास्त्रों में जैसी महिमा सत्संग की गाई गई है –
सतां प्रसंगान मम वीर्य संविदो , भवन्ति हृत्कर्ण रसायना: कथा:। तज्जोषणादा श्वपवर्ग वर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्ति रनुक्रमिष्यति।
( भागवत 3/25/25)
अर्थात् महापुरुषों के निरंतर सान्निध्य से धीरे धीरे स्वत: ही जीवों के हृदय में क्रमश: श्रद्धा, प्रेम, व भक्ति उत्पन्न होने लगती है।
ठीक यही प्रभाव जो सत्संगति का यहाँ बताया गया है वही प्रभाव महापुरुषों द्वारा निर्मित देवालयों का भी होता है । उन मंदिरों के सेवन से धीरे धीरे स्वत: ही श्रद्धा, प्रेम, भक्ति क्रमश: प्राप्त होते हैं । यही श्री महाराज जी उपर्युक्त दोहे में बता रहे हैं ।
पुन: वे कहते हैं –
मेरा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
भक्ति दिला दे भगवान मिला दे ॥
मेरा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
भक्ति रहित को भी भक्त बना दे ॥
मेरा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
भक्त बना दे भगवान से मिला दे ॥
हमारा ये भक्ति मंदिर युगों – युगों तक भक्ति की अज्रस धारा प्रवाहित करता रहेगा ।

इसी प्रकार श्री महाराज जी द्वारा श्री वृंदावन धाम में निर्मित प्रेम मंदिर भी पंचम पुरुषार्थ प्रेम का ही साक्षात स्वरूप है । इसी प्रेम तत्व की महिमा को जगत में प्रकाशित करने के लिए ही श्री महाराज जी ने इसका नाम प्रेम मंदिर रखा है ।
प्रेमाधीन ब्रह्म श्याम वेद ने बताया ।
याते याय नाम प्रेम मंदिर धराया ॥
श्री महाराज जी द्वारा किये गये इन मंदिरों के नामकरण भी अद्वितीय हैं । संसार में अन्य मंदिरों के नाम या तो भगवान से संबद्ध होते हैं यथा लक्ष्मीनारायण मंदिर, श्री राधा वल्लभ मंदिर इत्यादि या फिर साधारण मनुष्य जो इन मंदिरों का निर्माण करवाते हैं वे प्रसिद्धि के लिए अपने नामों पर इनका नामकरण करते हैं यथा बिड़ला मंदिर, जे. के. मंदिर । लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि भगवान को भी अपने वश में कर लेने वाला प्रेम तत्त्व भगवान से भी बड़ा है । इसीलिए इसी प्रेम तत्व की महत्ता को जगत में प्रकट करने के लिए इस मंदिर का नाम प्रेम मंदिर रखा, इसी प्रकार प्रेम का ही पर्याय है भक्ति जो भगवान से भी बड़ी है इसीलिए मनगढ़ में स्थित मंदिर का नाम भक्ति मंदिर रखा । ऐसे अद्भुत भगवत्स्वरूप मंदिर विश्व में और कहीं नहीं हैं, कुछ मंदिर बहिरंग रूप से दिखने में भव्य हो सकते हैं लेकिन चूंकि वो किसी महापुरुष द्वारा निर्मित नहीं है, वहाँ के विग्रह किसी महापुरुष द्वारा प्रतिष्ठित नहीं हैं इसलिए वहाँ से वो अलौकिक रस नहीं मिल सकता जो श्री महाराज जी का सान्निध्य प्राप्त इन धरोहरों में है।
यद्यपि समस्त देवालय परम पवित्र एवं वंदनीय होते हैं क्योंकि 'प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना' इसलिए कोई मंदिर छोटा बड़ा नहीं होता लेकिन फिर भी जैसे भगवान तो कण कण में व्याप्त हैं –
देश काल अरु विदिसहुँ माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं
ऐसा कौनसा स्थान हैं, कौनसा कण है , जहाँ भगवान नहीं हैं । वो तो पाखाने में भी हैं, मयखाने में भी हैं, सर्वत्र हैं लेकिन फिर भी मयखाने और मंदिर में अंतर हो जाता है । जो लाभ हम मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण में जाकर ले सकते हैं वो मयखाने में जाकर नहीं ले सकते जब तक कोई बहुत उच्च कोटि का साधक या सिद्ध न हो । इसी प्रकार मंदिर मंदिर में भी अंतर होता है, विग्रह विग्रह में भी अंतर हो जाता है ।
जो मंदिर जो विग्रह किसी महापुरुष द्वारा प्रकटित होते हैं, प्रतिष्ठित होते हैं उनके दर्शन, स्पर्श, प्रदक्षिणा इत्यादि से विशेष लाभ प्राप्त होता है जो अन्य साधारण मनुष्यों द्वारा निर्मित मंदिरों से नहीं होता ।
भक्ति मंदिर व प्रेम मंदिर श्री महाराज जी द्वारा समस्त विश्व को प्रदत्त अनमोल धरोहर हैं दिव्य प्रेमोपहार हैं । जितने लोग यहाँ दर्शन करने के लिए आते हैं यहाँ के अलौकिक वातावरण से अभिभूत हो जाते हैं । श्री राधाकृष्ण एवं युगल सरकार श्री सीताराम के दर्शन करके मंत्रमुग्ध हो जाते हैं । और बरबस कह उठते हैं कि प्रभु की ऐसी अनुपम छवि तो हमने कहीं नहीं देखी, प्रेम मंदिर के दर्शन करके तो लोग यहाँ तक कहते हैं ये तो ऐसा प्रतीत होता है मानो गोलोक से ही नीचे उतरा है किसी ने बनवाया नहीं है ।
इन सभी दिव्य अनुभूतियों का कारण श्री महाराज जी की दिव्यता ही है । भगवत्स्वरूप श्री कृपालु महाप्रभु ने स्वयं अपने सान्निध्य में इन युगल विग्रहों की प्राण – प्रतिष्ठा करवाई है, हर विधि - विधान में वे स्वयं सम्मिलित हुए हैं । मंदिर की नींव रखने से लेकर शिखर स्थापना एवं ध्वजारोहण तक प्रत्येक क्रिया के साक्षी बने हैं, कलश, ध्वजा इत्यादि सभी वस्तुओं को उनका दिव्य स्पर्श प्राप्त हुआ है । इसलिए यहाँ का एक – एक कण दिव्य है, उन्होंने स्वयं अनेकों बार इन्हीं मंदिरों में बैठकर संकीर्तन रस बरसाया है, प्रवचन दिया है।
हमें शिक्षा देने के लिए स्वयं दोनों समय ( प्रात: व संध्या ) मंदिर आकर स्वयं युगलरूप होकर भी इन युगल विग्रहों को प्रणाम किया है, इनके श्रृंगार का निरीक्षण किया है, निर्देशन दिये हैं, हर पर्व पर इनका अभिषेक किया है, आरती उतारी है, साधकों को साथ लेकर प्रदक्षिणा
की है । स्वयं अपने करकमलों से गंगाजल इत्यादि द्वारा इन मंदिरों का मार्जन किया है।
श्री महाराज जी द्वारा प्रतिष्ठित इन दिव्य विग्रहों के दर्शन अगर कोई समाहित चित्त होकर करे तो जिनके नेत्रों से प्रेम रस छलक रहा है ऐसे श्री युगलसरकार को साक्षात अपने समीप ही पायेगा ।
श्री महाराज जी के सत्य संकल्प का, उनकी अकारण करुणा का ही जीवंत स्वरूप हैं ये मंदिर ।
श्री कृपालु महाप्रभु द्वारा प्रतिष्ठित इन मंदिरों के दिव्य विग्रह पाषाण हृदय व्यक्तियों के भीतर भी बरबस प्रेम रस का संचार कर देते हैं ।
इन दोनों मंदिरों के कण – कण को जगद्गुरूत्तम का स्पर्श प्राप्त है, उनका सान्निध्य प्राप्त है यहाँ के युगल विग्रह उन्हीं के द्वारा प्रतिष्ठित हैं इसलिए जो अलौकिक शक्ति अथवा विलक्षण रस इन मंदिरों में है, पापों को नष्ट करने की, हमारे मलिन अंत:करणों को पावन बनाने की जो शक्ति इन मंदिरों में हैं वो किसी साधारण मनुष्य द्वारा बनवाये गये मंदिरों मे नहीं हो सकती ।
यद्यपि भगवान वहाँ भी हैं , कण – कण में व्याप्त हैं और साधकों की भावना के अनुरूप ही उनको फल भी मिलता है लेकिन फिर भी रस वैलक्षण्य है, शक्ति भेद है। वही भेद जो ब्रह्म व भगवान के स्वरूपों में अभेद होते हुए भी ब्रह्मानंद व प्रेमानंद में बताया गया है ।
प्रेमानंद बिंदु पर वारौं कोटि ब्रह्मानंद ( श्री महाराज जी ) प्रेमानंद के एक बिंदु पर करोडों ब्रह्मानंद न्यौछावर किये जा सकते हैं यद्यपि दोनों अनंत मात्रा के दिव्यानंद हैं उनमें छोटे बड़े का प्रश्न नहीं हो सकता तथापि इतना अन्तर है
ब्रह्मानंदो भवेदेष चेत्परार्ध गुणीकृत:
नैति भक्ति सुखाम्भोधे: परमाणुतुलामपि ( भक्ति रसामृत सिंधु )
अर्थात् परार्ध से गुणा किये जाने पर भी ब्रह्मानंद प्रेमानंद के एक कण के समान भी नहीं हो सकता । ऐसा ही रस अथवा शक्ति भेद श्री महाराज जी द्वारा निर्मित मंदिरों व अन्य साधारण मनुष्यों द्वारा निर्मित मंदिरों में हैं ।
अन्य कई उदाहरणों द्वारा भी इस भेद को समझा जा सकता है यथा भगवान का दिव्य देह सच्चिदानंद स्वरूप होता है, उनके प्रत्येक अंग की माधुरी नित्य नवायमान है । फिर भी सभी अंग "आनंदमात्रकरपादमुखोदरादि" अर्थात् आनंद तत्व से निर्मित होते हुए भी समस्त शास्त्रों में भगवान के चरणों की महिमा विशेष रूप से गाई गई है । ऐसे ही समस्त देवालयों में अभेद होते हुए भी श्री महाराज जी द्वारा निर्मित देवालय विशिष्ट हैं ।
जैसे वही एक भगवन्नाम एक साधारण मनुष्य के मुँह से सुना जाये और वही राधे नाम एक महापुरुष के मुखारविंद से श्रवण किया जाये तो उस नाम की मधुरता में उसकी शक्ति में आकाश पाताल का अन्तर हो जाता है । यद्यपि राधे नाम वही है अनंत शक्ति संपन्न लेकिन फिर भी किसी महापुरुष के मुखारविंद से नि:सृत होने पर उसकी विलक्षणता उसकी अलौकिकता का अलग ही प्रभाव पड़ता है, उनकी वाणी सीधे हमारे हृदय को जाकर भेदती है, अपनी ओर खींचती है । एक विलक्षण रस का ही आस्वादन हम करते हैं ।
ऐसे ही समस्त मंदिरों में अभेद होते हुए भी, किसी महापुरुष द्वारा प्रकटित मंदिरों, उनके द्वारा प्रतिष्ठित विग्रहों में विशेषता, विलक्षणता भिन्न होती है, फिर यहाँ तो स्वयं युगलस्वरूप जगद्गुरूत्तम द्वारा ये मंदिर निर्मित है ऐसे में इन अतुलनीय मंदिरों की महिमा का वर्णन शब्दों में किस प्रकार हो सकता है ?
इन दिव्य मंदिरों में श्री कृपालु महाप्रभु के दिव्य वपु की, उनकी दिव्य वाणी की दिव्य तरंगे सदा प्रवाहित होती रहती हैं। उन्हीं दिव्य तरंगों के पुंज स्वरुप ही हैं ये परम पावन देवालय ।
इसलिए जो लाभ हम इनके सेवन से ले सकते हैं वो अन्यत्र मिलना दुर्लभ है ।
ऐसे ही एक अद्वितीय मंदिर ‘कीर्ति मंदिर’ का निर्माण रंगीली महल, बरसाना में हो रहा है जो शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण होने वाला है । यह अनुपमेय मंदिर समस्त विश्व में कीर्ति मैया का प्रथम मंदिर होगा जिन्हें महारास रस की अधिष्ठात्री राधारानी की जननी बनने का गौरव प्राप्त हुआ । यहाँ किशोरी जी कीर्ति मैया की गोद में अपने बालरुप में दर्शन देकर भक्तों को कृतार्थ करेंगी

अस्तु , हम सभी को श्री महाराज जी द्वारा निर्मित इन देवालयों का महत्व समझकर, बारंबार इनका सेवन करके अपने अंत:करण को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए ।
श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय।
श्रीमद् युगल सरकार की जय।
श्री प्रेम मंदिर की जय।
श्री भक्ति मंदिर की जय।
श्री कीर्ति मंदिर की जय।

----#सुश्रीश्रीधरीदीदी{प्रचारिका,जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज}.
यह मनुष्य का शरीर बार–बार नहीं मिलता। दयामय भगवान् चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं। मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टाँग कर मुख तक बाँध देते हैं। जब गर्भ में बालक के लिए कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से बाहर निकाल दीजिये, मैं केवल आपका ही भजन करूँगा । जन्म के पश्चात् जो श्यामसुन्दर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, इसीलिये सावधान हो कर श्यामसुन्दर का स्मरण करो |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त–माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुंदर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम-लीला-गुण आदि का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार-बार यह महसूस करो कि श्यामसुंदर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहें हैं, और उन्हें आप दिखा-दिखा कर कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी। एक बार करके देखिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगद्गुरु वंदना:
भक्तियोगरसावतार भगवतीनंदन सद्गुरु के मार्गदर्शन में भक्तियोग की साधना करने वाले भक्तों द्वारा भक्ति स्वरुप गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।
भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित करके असंख्य जीवों का कल्याण करने वाले सदगुरु देव को कोटि कोटि प्रणाम।
भक्ति महादेवी को जन जन के हृदय में स्थापित करके भक्तियोग रसावतार स्वरुप को प्रमाणित करने वाले भक्तिरस सिंधु प्रिय गुरुवर को सहस्त्रों भक्तों का भक्ति युक्त प्रणाम।
साधना का प्राण 'रूपध्यान' है, यह बुद्धि में बैठा कर श्री श्यामा श्याम की मनोमयी मूर्ति सबके हृदय में प्रतिष्ठापित करने हेतु असंख्य कीर्तन,पद,दोहे लिखकर ,उनका मधुर गान कराने वाले संकीर्तन सम्राट ,प्रेम रस रसिक प्रिय गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।