Wednesday, April 29, 2020

गुरुशरणागति गोविंद राधे।
श्यामा श्याम भक्ति मन शुद्ध करा दे।।
भावार्थ:- सद्गुरु की शरणागति में रह कर जो जीव श्यामा श्याम की भक्ति करते हैं, उनका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है।
गंगा जल शुद्ध जल गोविंद राधे।
गंगा में मिले जो जल गंगा बना दे।।
भावार्थ :- यदि गंगा में अपवित्र जल भी मिल जाता है तो गंगा उस अपवित्र जल को स्वयं में मिला कर गंगा जल ही बना देती है।
हरि गुरु गंगा सम गोविंद राधे।
उनमें ही एक हो जा गंगा बना दे।।
भावार्थ:- हरि-गुरु गंगा जल के समान है। तू अपने मन को उनमें लगा दे। तू भी गंगा जल बन जायेगा।
#प्रश्न : महाराज जी! जब मृत्यु निश्चित है तो बीमार होने पर दवाई करें या न करें, उसे तो समय से जाना ही है?
#उत्तर : दो प्रकार का रोग होता है - एक को कहते हैं #कर्मज, एक को कहते हैं #दोषज, हमारे #आयुर्वेद में। आयुर्वेद का मैं आचार्य हूँ। तो आयुर्वेद में दो प्रकार की बीमारी बताई गई है। जो आपके आहार-विहार की गड़बड़ी से हुआ है, यानी आपकी गड़बड़ी से हुआ है, खानपान जो कुछ अण्ड-बण्ड आपने किया उसके कारण हो गया है, उसको #दोषज कहते हैं। अब जो प्रारब्ध का कर्मफल भोग है, उसके द्वारा जो रोग होता है वो #कर्मज कहलाता है। तो कर्मज रोग का तो इलाज करो, न करो, बराबर है। जब प्रारब्ध भोग समाप्त हो जाएगा तो अपनेआप ठीक हो जाएगा। फिर तो अण्ड-बण्ड दवा भी करो तो भी वो रोग चला जायेगा। नाम करते हैं लोग, अरे हमने ऐसा कर लिया, हम तो ठीक हो गए। वो कर्मज व्याधि थी इसलिए ठीक हो गया अपनेआप। वो बता रहा है ऊटपटाँग इलाज। उसने झाड़-फूँक कर दिया, उसने ये कर दिया।
दोषज बीमारी जो होगी, जो हमारी गड़बड़ी से हुई है, उसमें तो दवा काम करेगी, इलाज कराना होगा। अब चूँकि मालूम नहीं हो सकता कि ये कर्मज है कि दोषज है, इसलिए दवा सबको करनी पड़ती है।
समस्त वेदों-शास्त्रों में भक्ति को ही भगवत्प्राप्ति का एक मात्र मार्ग बताया गया है।
भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं पश्यति भक्तिरेवैनं दर्शयति
भक्तिवशः पुरुषः भक्तिरेव भूयसी
(माठर श्रुति)
अर्थात् केवल भक्ति द्वारा ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।
स्कन्द पुराण में वेदव्यास जी ने कहा -
आलोड्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरि: ।।
अर्थात् 'मैंने समस्त शास्त्रों को मथकर, बारम्बार विचार करके एक ही निष्कर्ष निकाला है कि केवल भगवान की भक्ति ही वरणीय है। यही जीवन का सार है।'
सब कर मत खगनायक एहा,
करिअ राम पद पंकज नेहा ।
(रामचरित मानस)
तात्पर्य यही है कि भक्ति ही सर्वोपरि तत्त्व है। अपना परम कल्याण चाहने वाले मनुष्यों को एकमात्र इसी का अवलम्ब लेना चाहिए और भक्ति मार्ग के अधिकारी सभी जीव हैं -
सर्वेधिकारिणो ह्यत्र हरिभक्तौ यथा नृप
(पद्म पुराण)
शास्त्रतः श्रूयते भक्तौ नृमात्रस्याधिकारिता
(भक्ति रसामृत सिंधु)
चराचर सब जीव गोविंद राधे,
भक्ति पथ के अधिकारी बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
ये भक्तिमार्ग सरलातिसरल मार्ग है और घोर से घोर पापात्मा से लेकर ब्रह्मा तक सभी भक्ति के अधिकारी हैं -
भक्ति के अधिकारी गोविंद राधे,
पतितों ते ब्रह्मा तक सब हैं बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
सदाचारी तो भक्ति कर ही सकता है लेकिन दुराचारी को भी इसमें प्रवेश पाने का अधिकार है -
अपिचेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यक् व्यवसितो हि सः।।
(गीता)
सदाचारी दुराचारी गोविंद राधे,
दोनों अधिकारी भक्ति पथ के बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
परम अपवित्र व्यक्ति भी भक्ति करके परम पवित्र बन जाता है। हमारे भक्तवत्सल भगवान केवल भाव के भूखे हैं, प्रेम के भूखे हैं, फिर भक्ति करने वाला कौन है, उसकी जाति, आचरण, रूप, गुण इत्यादि किसी भी बहिरंग चीज़ पर वे विचार नहीं करते। केवल उस जीव के प्रेम से,उसकी अनन्य भक्ति से ही रीझ जाते हैं, उसे सदा-सदा के लिए अपना बना लेते हैं -
व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का
कुब्जाया: किमु नामरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनम् ।
वंशः को विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषं
भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधव: ।।
अर्थात् 'व्याध (रत्नाकर) का कोई पवित्र आचरण नहीं था लेकिन भक्ति द्वारा वह महापुरुष (वाल्मिकी) बन गया। ध्रुव ने इतनी अल्पायु में ही भक्ति द्वारा ध्रुव लोक प्राप्त कर लिया। गजराज के पास कोई ज्ञान नहीं था लेकिन भक्ति द्वारा वह भी वैकुण्ठ पहुँच गया। कुब्जा ने कुरूप होते हुए भी श्री कृष्ण को प्रियतम रूप में प्राप्त किया और सुदामा ने दरिद्र होकर भी भक्ति द्वारा द्वारिका जैसा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। विदुर के अकुलीन होने पर भी भगवान ने प्रेमपूर्वक उनके यहाँ केले के छिलके को ही विभोर होकर ग्रहण किया और उग्रसेन ने बलरहित होकर भी भक्ति द्वारा मथुरा का राज्य प्राप्त कर लिया।'
अस्तु, तात्पर्य यही है कि भगवान केवल भक्ति से ही रीझते हैं अन्य किसी गुण, योग्यता इत्यादि की अपेक्षा नहीं करते। इसलिए भक्ति मार्ग के अधिकारी सभी जीव हैं। हम किसी भी स्थिति में हों, किसी भी स्थान पर हों, सदा सर्वत्र एकनिष्ठ भक्ति करके भगवान तक पहुँच सकते हैं, उनकी कृपा के अधिकारी बन सकते हैं।
कितने आश्चर्य की बात है कि दिन रात मिथ्या अहंकार में जीता हुआ ये मनुष्य अपने चारों ओर मृत्यु का तांडव देखते हुए भी अपनी मृत्यु को भूल जाता है। महाभारत में जब एक यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया - 'किमाश्चर्यं ?' संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? तो उस समय धर्मराज युधिष्ठिर ने यही उत्तर दिया था -
अहन्यहनिभूतानि गच्छन्तीह यमालयम्
शेषा: स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।
अर्थात् प्रतिदिन लोगों को अपनी आँखों के सामने इस संसार से जाते हुए, मरते हुए देखकर भी शेष लोग यही समझते हैं हमें तो अभी यहीं रहना है, इससे बड़ा आश्चर्य और कोई नहीं हो सकता।
मनुष्य की सारी लापरवाहियों का, अपराधों का, अज्ञानता का कारण यही है कि वह अपनी मृत्यु को भूल जाता है कि काल निरंतर घात लगाए बैठा है और किसी भी क्षण में यहाँ से उसका टिकट कट जाएगा, अर्थात् इस संसार से जाना होगा। यह मानव देह छिन जाएगा और अपने-अपने कर्मों के अनुसार पुनः अन्य योनियों में भ्रमण करते हुए दुःख भोगना होगा। हमें बारम्बार इस जीवन की क्षणभंगुरता पर विचार करना चाहिए कि हमारा अस्तित्व है ही क्या? कबीरदास जी ने कहा -
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात,
एक दिना छिप जायेगा, ज्यों तारा परभात।
अरे! हमारी हैसियत तो केवल एक पानी के बुलबुले जितनी है जो कुछ सेकण्ड्स को जल में उत्पन्न होकर फूट जाता है -
आयु जल बुलबुला गोविंद राधे,
जाने कब फूट जाये सबको बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
फिर भी मनुष्य इस सत्य से मुँह मोड़कर दिन-रात इस अनित्य जगत को अपना मानकर धन-सम्पत्ति के पीछे दौड़ते-दौड़ते ही अचानक काल के गाल में समा जाता है। जीव की इस दयनीय स्थिति पर उदास होते हुए कबीरदास जी ने कहा -
कौड़ी-कौड़ी जोरि के, जोरे लाख करोर,
चलती बेर न कछु मिल्यो, लइ लंगोटी तोर,
हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास,
सब जग चलता देख के, भयो कबीर उदास।
यही हमारे जीवन का अकाट्य सत्य है। सारे वेद-शास्त्र, संत यही बात हमें समझाते हैं कि इस सत्य से आँख न मूँदों बल्कि बारम्बार अपनी मृत्यु का चिंतन करते हुए अपने मन को निरंतर हरि-गुरु भक्ति में ही लगाने का प्रयास करो, यही जीवन का सार है। मृत्यु के उपरान्त केवल यह भक्ति ही साथ जाएगी जो हमें सद्गति दिला सकती है और जिससे संसार में आवागमन का चक्र समाप्त हो जाता है। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही यह मानव जीवन भगवान ने कृपा करके प्रदान किया है। अगर अब भी हमने शेष जीवन को नहीं सँवारा और बिना भगवद्भक्ति के ही प्राण पखेरू उड़ गए तो केवल पछताना ही शेष रह जाएगा। इसलिए संत नारायण दास चेताते हुए कहते हैं -
बहुत गई थोड़ी रही, नारायण अब चेत,
काल चिरैया चुग रही, निसि दिन आयु खेत।
इसी आशय से जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं -
सारी में थोड़ी बची गोविंद राधे,
बची खुची थोड़ी ते सारी बना दे।
(राधा गोविंद गीत)
अर्थात् अब भी जो आयु शेष है उसमें भी भक्ति करके तुम अपनी अनादिकालीन बिगड़ी बात बना सकते हो। इसलिए देर न करो, उधार न करो, कल पर न टालो -
न श्वः श्व उपासीत को हि पुरुषस्य श्वो वेद (वेद)
वेद कहता है 'कल करूँगा, कल करूँगा' ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिए। मनुष्य के कल को कौन जानता है, कल का दिन मिले न मिले। इसलिए भक्ति हेतु अभी से संकल्पबद्ध हो जाओ -
आज करूँ कहो जनि गोविंद राधे,
अभी करूँ यह कहि मन को लगा दे।
( राधा गोविंद गीत )
और मृत्यु का चिंतन जितना प्रबल होगा हमें भक्ति का संकल्प लेने में उतनी आसानी होगी। इसलिए कहा गया -
दो बातन को भूल मत, जो चाहे कल्यान,
नारायण इक मौत को, दूजो श्री भगवान।
अस्तु अपने कल्याण के लिए हमें बची हुई सभी श्वांसों को प्रभु को समर्पित करना है, उन्हीं का चिंतन करना है ताकि इस मृत्यु की भी सदा-सदा को मृत्यु हो जाए, यह फिर हमारे पास न फटक सके और हम अनंतकाल तक भगवान के दिव्यधाम में रहकर उनकी नित्य सेवा का सौरस्य प्राप्त कर सकें -
अर्पण कर दो राम को, बचे हुए सब श्वांस,
स्मरण करो प्रभु का सदा, मन में भर उल्लास।
मौत मरेगी सदा को, फिर न आयेगी पास,
रामधाम में पहुँच तुम, बन जाओगे दास।
कैसी विचित्र स्थिति है मनुष्य की? दिन-रात अनेकानेक चिंताओं में निरंतर घुलता हुआ भी वह व्यक्ति न तो किसी के सामने अपनी दयनीय स्थिति को स्वीकार कर पाता है और न स्वयं ही इस वस्तुस्थिति पर विचार कर पाता है कि आखिर क्यों हम इस प्रकार घुट-घुट कर तिल-तिल मरते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं। संसार के पीछे भागते हुए, ढेरों कामनाओं से ग्रसित होकर हम हर समय चिंतित रहते हैं, आशंकित रहते हैं और यह भी नहीं समझ पाते कि यह चिंता तो चिता का ही दूसरा रूप है बस अंतर इतना है कि -
चिता तो जलावे शव गोविंद राधे,
चिंता जलावे जीवित को बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
हमारे परम पूज्य गुरुदेव 'चिंता और चिता' के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहते हैं अरे दोनों में इतना बड़ा अंतर है कि चिता तो शव को यानि मृत व्यक्ति को जलाती है लेकिन यह चिंता रूपी चिता तो जीवित व्यक्ति को ही जला देती है। इसीलिए कबीरदास जी ने कहा -
चिंता ऐसी डाकिनी, काटि कलेजा खाय,
वैद्य बिचारा क्या करे, कहाँ तक दवा खवाय।
अरे यह चिंता तो एक डाकिनी के समान है जो व्यक्ति के हृदय को काट कर खा जाती है। चिंतित व्यक्ति का उपचार कोई वैद्य भी नहीं कर सकता। वह कितनी ही दवा खिलाए, चिंताग्रस्त व्यक्ति पर उसका कोई असर नहीं हो सकता। क्योंकि यह चिंता तो भीतर का रोग है, मानसिक रोग है, इसका उपचार बाहरी दवा से संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यही है कि चिंता मनुष्य को खोखला कर देती है, वह भीतर से भी टूट जाता है, निराश हो जाता है, व्यथित रहता है और बाहर से भी रोगग्रस्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए भी चिंता का विषय बन जाता है। ऐसे निरुत्साहित, चिंतित व्यक्ति का संग भी दूसरों को रुचिकर नहीं लगता।
तो चिंता से क्योंकि हमारा कोई इहलौकिक, पारलौकिक लाभ नहीं हो सकता इसलिए वह हर प्रकार से त्याज्य है। हमें बारम्बार इससे होने वाली हानियों पर विचार करके इसे अपने से दूर ही रखना चाहिए। अपने ऊपर कभी चिंता को हावी नहीं होने देना चाहिए और साथ ही यह सिद्धांत भी भलीभाँति समझ लेना चाहिए जैसा कि तुलसीदास जी ने अपने शब्दों में कहा -
तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होके सोए,
अनहोनी होती नहीं, होनी हो सो होए।
अर्थात् इस संसार में कुछ भी अनहोनी नहीं होगी और जो होना है उसे होने से कोई रोक भी नहीं सकता, वह तो होकर ही रहेगा। इसलिए वे कहते हैं कि तुम तो केवल प्रभु श्री राम पर विश्वास रखकर चैन की बांसुरी बजाओ।
यानि चिंता नहीं उनका चिंतन करो। प्रभु के शरणागत होकर उनका चिंतन करना ही मनुष्य का एकमात्र परम चरम कर्त्तव्य है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य अकर्मण्य हो जाये, अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाये । इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य को सभी आशंकाओं के तनाव से मुक्त होकर प्रभु का स्मरण करते हुए संसार में सर्वत्र केवल कर्त्तव्य-पालन मात्र करना चाहिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। हमारा अधिकार केवल कर्म करने में है फल प्राप्ति में नहीं -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
(गीता : 2-47)
अनासक्त भाव से कर्म करने वाले की चाह व चिंता दोनों ही समाप्त हो जाती हैं। ऐसे शरणागत भक्त की स्थिति को स्पष्ट करते हुए ही कहा गया है -
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह,
जाको कछु न चाहिए, सोई साहनसाह।
जो अपनी जीवन नैया को इस भवसागर के खेवैया के हाथों सौंपकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है वह भक्त केवल भगवान की इच्छा में ही अपनी इच्छा रखता है इसलिए कभी चिंतित नहीं होता। हर स्थिति में उनकी कृपा का अनुभव करके विभोर रहता है -
राजी हैं हम उसमें जिसमें तेरी रजा है,
याँ यों भी वाह वा है, और वों भी वाह वा है।
आत्मकल्याण के लिए हमें इन्हीं बातों पर गहन विचार करके प्रतिक्षण केवल हरि-गुरु का चिंतन करना चाहिए चिंता नहीं।

Wednesday, April 22, 2020

भगवच्चरण चंचरीक साधकवृन्द !
सप्रेम राधे राधे !
साधक को किस प्रकार अपनी साधना के प्रति सावधान रहते हुए सदा अडिग रहना चाहिए उसी को स्पष्ट करते हुए 'राधा गोविंद गीत' में हमारे परम पूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं
- भयंकर आंधी में गोविंद राधे ।
पर्वत जैसे अचल बता दे ।।
ऐसे ही साधक गोविंद राधे ।
साधना में रहे अटल बता दे ।।
जैसे भयंकर आंधी आने पर भी पर्वत पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता वह अचल रहता है इसी प्रकार घोर से घोर विकट परिस्थितियाँ आने पर भी साधक को घबराना नहीं चाहिए , निराश होकर साधना से कभी विमुख नहीं होना चाहिए अपितु हरि गुरु पर दृढ़ विश्वास रखकर अपनी साधना के प्रति सदैव अटल रहना चाहिए । किसी भी प्रकार की संसार की बाधा को अपनी साधना में कभी बाधा नहीं बनने देना चाहिए । ऐसा सजग और सावधान साधक ही निरंतर तीव्र गति से लक्ष्य की ओर अग्रसर होता जाता है ।
भगवत्कृपा से हम सभी अपनी साधना के प्रति इसी प्रकार अडिग रहकर उन्नति कर सकें इसी मंगलकामना के साथ-
प्रिय भारतवासियों...भारत माता की जय ।
वेदों में भगवान को ही प्रकाशस्वरूप बताया गया है -
'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णम् तमस:परस्तात्'
आज सम्पूर्ण मानव जाति जिस 'कोरोना रूपी अंधकार' से भयभीत है उस अंधकार की समाप्ति के लिए हम सभी 'ईश्वर रूपी प्रकाश' की शरण ग्रहण करें । आज का दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम उसी महाप्रकाश की ओर संकेत कर रहा है कि हम सब एकजुट होकर अपने भीतर व्याप्त उस महाप्रकाशस्वरूप ईश्वर का अनुभव करके उस पर विश्वास रखकर मिलकर उससे ये प्रार्थना करें -
'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
हे नाथ! आज इस महासंकट से लड़ने में आप ही हमारी सहायता कीजिये और ऐसी कृपा कीजिये कि इस विकट समय से शिक्षा लेकर अपना शेष समय हम आपकी भक्ति करके सार्थक कर सकें। हम अज्ञान रूपी अंधकार को भी जीत कर आपको प्राप्त कर सकें।
पुरुषार्थ के साथ ही उस महाप्रकाश रूपी भगवान की कृपा से ही हम अवश्य विजयी होंगें यही दृढ़ विश्वास बनाये रखें। उसी महाप्रकाश की किरणें होने से हम सभी एक हैं हमेशा एक दूसरे के साथ हैं ।
हमारी सेवा में दिन-रात लगे हुए देशवासियों का हृदय से बहुत बहुत आभार व नमन।
आप सभी सुरक्षित रहें , स्वस्थ रहें इसी शुभकामना के साथ-
आपकी दीदी:
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_प्रचारिका_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
समस्त भगवत्प्रेमियों को जय श्री राधे !
अनंतानंत जन्मों से हम अनवरत भगवान को खोज रहे हैं लेकिन उसे प्राप्त नहीं कर सके। इसका एकमात्र कारण है अविश्वास। हर जन्म में हमें संतों ने समझाया कि ईश्वर तो तुम्हारे हृदय में ही बसे हैं , तुम्हारे पास ही हैं , तुम बाहर कहाँ उसे ढूंढते फिर रहे हो ? लेकिन हमने कभी संतवाणी, वेदवाणी पर विश्वास नहीं किया । सारे संसार में आनंद ढूंढते रहे लेकिन हृदय में स्थित आनंदसिन्धु की ओर कभी देखा ही नहीं । इसीलिए तो कबीरदास जी ने हँसते हुए कहा -
धोबिया जल बिच मरत पियासा ।
जल बिच ठाढ़ पियत नहिं मूरख,अच्छा जल है खासा।।
हमारी स्थिति उस धोबी की भाँति है जो जल के बीच में खड़ा होकर भी प्यासा होने की बात करता है , उस जल को ग्रहण नहीं करता ।
हमें उस ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कुछ और नहीं करना है केवल हृदय में विराजित ईश्वर का अनुभव करना है , इसी के लिए साधना बताई जाती है।
बाहर ढूंढे क्यों मना,उर में है तेरा सजना।
तेरे मध्य बैठा सजना, मानो यह श्रुतिवचना ।
हमारे परम पूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं तुम्हारे प्रियतम, तुम्हारे जीवन सर्वस्व तुम्हारे ही भीतर बैठे हैं इस वेदवाणी को शत-प्रतिशत मान लो तो तुम्हारा काम बन जाये ।
हम सभी गुरु अनुकम्पा से अज्ञान तिमिर को भगाकर हृदय सिंहासन पर विराजित प्रभु के दर्शन कर सकें इसी शुभकामना के साथ-
तत्त्व जिज्ञासु भक्तवृन्द ! सप्रेम राधे राधे ।
यद्यपि ये मानव देह हर प्रकार से निंदनीय है , क्षणभंगुर है लेकिन केवल पुरुषार्थ की शक्ति के कारण ही इसे वंदनीय कहा गया है । भक्ति रूपी पुरुषार्थ करके हम इसी मरणशील देह द्वारा अमरत्व को प्राप्त कर सकते हैं-
देह तो मरणशील गोविंद राधे ।
किन्तु दिव्य प्रेम अमरत्व दिला दे ।।
(राधा गोविंद गीत )
जैसे हीरे को काटने के लिए हीरे की ही आवश्यकता होती है इसी प्रकार इस क्षणभंगुर मानव देह से ही देह से मुक्ति ( संसार में आवागमन के चक्र से मुक्ति ) प्राप्त की जा सकती है । इसी नश्वर देह से ही अविनाशी हरि को प्राप्त किया जा सकता है ।
इसी कर्मप्रधानता के कारण ही इस मल मूत्र के पिटारे रूपी देह की याचना स्वर्ग के देवता भी करते हैं।
इस मनुष्य देह की सार्थकता केवल भगवद्भक्ति में ही है अन्यथा जीवन धारण तो वृक्ष भी करते हैं। हरि भक्ति रहित मनुष्य जीवन पशु तुल्य है -
कृष्ण भक्ति बिनु नर गोविंद राधे ।
कूकर शूकर सम हैं बता दे ।।
(राधा गोविंद गीत )
इसलिए इस अमूल्य देह का महत्त्व समझकर इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करने वाला ही विवेकी है।
भगवान् का कोई स्वरूप हो, किसी भी प्रकार से उपासना की जाय, लक्ष्य एक ही है- श्रीकृष्ण प्रेम। अज्ञानता के कारण प्रचलित विभिन्न वाद-विवादों का कितनी सरलता से समाधान करते हैं गुरुवर, समस्त शंकायें दूर हो जाती हैं । केवल श्री राधाकृष्ण निष्काम प्रेम की कामना शेष रह जाती है । दुर्गा जी, हनुमान जी, शंकर जी, सभी का सम्मान करते हुये, सबसे श्रीकृष्ण प्रेम की भिक्षा माँगना- यही उनका दिव्य संदेश है।