Saturday, May 12, 2018

आज्ञापालन ही अंतिम लक्ष्य है और प्रारम्भिक लक्ष्य है,और बीच में भी यही चलेगा। इसलिए सेवा को अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिये कि जिससे हमारे स्वामी को सुख मिले,वही क्रिया हमारे लिए कल्याणकृत है, हमारे सोचने के अनुसार नहीं। हमारी बुद्धि कभी वहाँ तक नहीं सोच सकती जहाँ तक हमारा स्वामी सोचता है। आज्ञापालन तो बहुत से लोग करते हैं ,लेकिन विपरीत चिंतन करके आज्ञापालन,हमको ऐसा कह दिया,करना तो पड़ेगा ही अब कह रहे हैं तो ,ये भीतर सोचा और गए ,गिर गए। अरे! मैंने कुछ कहा थोड़े ही। अरे! सोचा न ,भगवान के यहाँ कहने वहने का मूल्य नहीं हैं बस सोचने का मूल्य है , मन से चिंतन,इसलिए बहुत सावधान होकर हमें इस एक सेंटेन्स(sentence) पर बुद्धि को केन्द्रित करना है। सेवा पर। जिस आदेश से उनको सुख मिले बस वही सही है,हमारा ख्याल। फिर हमारा ख्याल लगाया तुमने ,फिर बुद्धि की शरणागति कहाँ है तुम्हारी । तुम गुरु की आज्ञा कहाँ मान रहे हो,ये तो अपनी आज्ञा मान रहे हो तुम। अत: क्षण-क्षण सावधान रहो और गुरु आज्ञा को ही सर्वोपरि मानो। अपनी दो अंगुल की खोपड़ी लगाना बंद करो,इसी ने तुम्हारे अनंत जन्म बिगाड़े हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
व्यर्थ चिंता मत करो , तुम सिर्फ हरि-गुरु का रुपध्यान करो और रो रोकर पुकारो मैं आ जाऊंगा ।
जैसे मैंने तुम्हें इस बार ढूंढ लिया था वैसे आगे भी ढूंढ लूंगा; यह मेरा काम है आप उसकी चिंता न करें ।
तुम सिर्फ निष्काम भाव से हरि-गुरु में ही अनन्य होकर साधना करते रहो , मेरा काम मै करुंगा ही जैसे सदा करते आया हूॅ, तुम अपना काम (मेरे द्वारा दिऐ उपदेशो के अनुसार साधना) करते रहो बस !! बाकी सब मेरा काम है मैं स्वयम् कर लूंगा, दृढ़ विश्वास करके साधना-पथ पर चलते रहो ।
----- तुम्हारा 'महाराजजी' ।
तुम ही मम नंदकुमार, थे हो रहिहौ सरकार।
तुम ही मम साँचो यार,टुक हमरिहुँ ओर निहार।
तू अंशी नंदकुमार ,मैं तो हूँ अंश तिहार।
यह नात सोचु सरकार, टुक हमरिहुँ ओर निहार।।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

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ऐ मन! भूत को भूल वो माफ़ हो जायेगा, उसको बैठ कर मत सोच कि मैंने यह पाप किया, मैंने ये जो किया सो किया, भूल जा, वर्तमान को देख। एक ही मन है दो नहीं है। अगर भूत का चिंतन करेगा, गंदी-गंदी बातें जो तुमने पाप की, की हैं तो फिर मन गंदा होता जायेगा। उसको भूल जा और वर्तमान में, मन में हरि गुरु को ही ला, शुद्ध कर दे मन। मन शुद्ध हो जायेगा, तो फ़िर गुरु दिव्य बना देगा स्वरूप शक्ति से। तब फ़िर लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी। भूत भविष्य सब बन जायेगा।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

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अब देखो यहाँ चार-पाँच सौ आदमी आये हैं | अब अगर एक आदमी सोचे- हमसे तो बात ही नहीं किया | भई कोई संसारी व्यवहार हो कि चलो एक-एक आदमी को नम्बर-वार बुलाओ और एक-एक आदमी से बात करो, ऐसा तो नहीं | और जिससे बात करेंगे उससे अधिक प्यार है, ये सोचना गलत है | मेरी गोद में कोई बैठा रहे 24 घण्टे इससे कुछ नहीं होगा | उसका मन जितनी देर मेरे पास रहेगा बस उसको हम नोट करते हैं | खुले आम सही बात करते हैं | बदनाम हैं सारे विश्व में हम स्पष्ट व्यक्तित्व में साफ-साफ | आप ये ना सोचें कि हम बहिरंग अधिक सम्पर्क पा करके और बड़े भाग्यशाली हो गए | और एक को बहिरंग सम्पर्क न मिला, उससे बात तक नहीं किया मैंने तो उसका कोई मूल्य नहीं है हमारे हृदय में | ये सब कुछ नहीं | कुछ लोगों की आदत होती है बहुत बोलने की | वो जैसे ही लैक्चर से उतरेंगे सीधे हमारे पास आएंगे और बकर-बकर बोलते जाएंगे | कुछ लोग अपना हृदय में ही भाव रखते हैं, दूर से ही अपना आगे बढ़ते जाते हैं | मैं तो केवल हृदय को देखता हूँ | मुझे इन बहिरंग बातों से कोई मतलब नहीं है | और कभी बहिरंग बातों के धोखे में आना भी मत | इतना कानून याद रखना- “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम” | जितनी मात्रा में हमारा सरेण्डर होगा, हमारी शरणागति होगी उतनी मात्रा में ही उधर से फल मिलेगा |
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Wednesday, May 2, 2018

अरे कृत्घन मन! धिक्कार है तुझे! जिन्होने तुझ नीच,अकिंचन व अधम को अपने श्री चरणों में स्थान दिया,तूने उस शरण्य की कृपा को भुला दिया। उनको ही दु:खी करने लगा। सच है जहाँ उन्होनें कृपालुता,क्षमाशीलता की पराकाष्ठा की है,वहीं तूने अधमता व अपराधशीलता की पराकाष्ठा की है। क्यों न आज से तू अपने प्यारे प्रभु को ही प्रसन्न करने का एक मात्र बीड़ा उठा कर चल। उसको प्रसन्न करने का एक मात्र यही उपाय है कि हम तुरंत यह प्रण करें कि " कोई हमसे कैसी भी कठोर से कठोर शब्दावली का प्रयोग करें,फिर भी उसके प्रति हम दुर्भावना आने ही न देंगे। सदा ही अपने दोषों को खोजकर उनको सुधारने में ही तत्पर रहेंगे।"
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अनेक प्रकार के दुःख भोगते किसी प्रकार हमने करवट बदलना सीखा,फिर बैठना सीखा। फिर खड़े होना सीखा। बार-बार गिरे, रोये, कष्ट हुआ गिरने में,लेकिन अभ्यास करते-करते चलने लगे।
लेकिन फिर दुःख ही दुःख।
इधर से बाप की डाँट , माँ की डाँट, भाई की डाँट,सब बड़े-बड़े लोग डाँटते जा रहे हैं।
कहाँ जा रहा है? क्या मुँह में डाल लिया? बदतमीज़।
और मुझको अक्ल तो थी नहीं कुछ, क्या करूँ?
भूख लगी थी, सामने एक लकड़ी पड़ी थी,उठाया और मुँह में डाल लिया।
लो, उसकी भी डाँट पड़ गई।
और कोई-कोई माँएँ तो खूब पिटाई करती हैं,
छोटे-से बच्चे की भी। रो दिये, क्या करें?
और बड़े हुये, स्कूल जाओ! और लो मुसीबत।अभी तक तो खेलते थे,कुछ मनोविनोद हो जाया करता था।
अब मम्मी-डैडी डंडा दिखा रहे हैं, स्कूल जा।
गये।वहाँ मास्टर बैठा है हौआ।
वो रुआब दिखाता है, डाँटता है,ऐ! क्या कर रहा है, ठीक से बैठो। अरे, मैं ठीक से बैठूँ, कितनी देर बैठूँ ठीक से?
घर में तो उछल-कूद करता था लगातार और यहाँ घंटों, दो घंटे, चार घंटे बैठे रहो।
ये आधीनता कितना कष्ट देती है। वो भी सहा।
अब परीक्षा आई। ओह! धुक-धुक, कहीं फ़ैल न हो जायें।।पास हुये, फिर आगे की पढ़ाई की चिन्ता।
इसी में हमारी चौबीस-पच्चीस साल की उम्र
समाप्त हो गई। उसके बाद मेम साहब आई।
और मुसीबत खड़ी हुई। उनका डर, बार-बार...
कहाँ गये थे? अरे, कहीं थे, तुमसे क्या मतलब?
मतलब कैसे नहीं है?
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
यदि आपके पास श्रद्धा रूपी पात्र है तो शीघ्र लेकर आइये और पात्रानुसार कृपालु महाप्रभु रूपी जलनिधि से भक्ति-जल भर-भरकर ले जाइए। स्वयं तृप्त होइये और अन्य की पिपासा को भी शांत कीजिये ।
यदि श्रद्धा रूपी पात्र भी नहीं है तो अपने परम जिज्ञासा रूपी पात्र से ही उस कृपालु-पयोधि का रसपान कर आनंदित हो जाइये ।
यदि जिज्ञासा भी नहीं है तो भी निराश न हों । केवल कृपालु-महोदधि के तट पर आकार बैठ जाइये, वह स्वयं अपनी उत्तुंग तरंगों से आपको सराबोर कर देगा । उससे आपमें जिज्ञासा का सृजन भी होगा, श्रद्धा भी उत्पन्न होगी और अन्तःकरण की शुद्धि भी होगी । तब उस शुद्ध अन्तःकरण रूपी पात्र में वह प्रेमदान भी कर देगा ।
और यदि उस कृपासागर के तट तक पहुँचने की भी आपकी परिस्थिति नहीं है तो आप उन कृपासिंधु को ही अपने ह्रदय प्रांगण में बिठा लीजिये । केवल उन्हीं का चिंतन, मनन और निदिध्यासन कीजिये । बस! आप जहां जाना चाहते हैं, पहुँच जाएँगे, जो पाना चाहते हैं पा जाएँगे ।
।। कृपानिधान श्रीमद सद्गुरु सरकार की जय ।।
भगवान का बल निरन्तर हमारे पास रहने पर भी सक्रिय नहीं होता, इसका कारण है कि हम उसे स्वीकार नहीं करते। जब भी हम भगवान् के बल का अनुभव करने लगेंगे, तभी वह बल सक्रिय हो जायेगा और हम निहाल हो जाएंगे।
हमारी भोगों में सुख की आस्था इतनी दृढ़मूल हो रही है कि वैराग्य के शब्दों से वह दूर नहीं होती। किसी महान विपत्ति का प्रहार तथा भगवान् अथवा उनके किसी प्रेमीजन महापुरुष की कृपा ही इस आस्था को दूर कर सकते हैं।
शरणागत वही हो पाता है, जो दीन है। जिसे अपनी बुद्धि, सामर्थ्य, योग्यता का अभिमान है, वह किसी के शरण क्यों होना चाहेगा। जब अपना सारा बल, बलों की आशा - भरोसा टूट जाते हैं, तब वह भगवान् की और ताकता है और उनका आश्रय चाहता है।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना कि मैं तो उठाने के क़ाबिल नहीं हूँ।
My Lord, You have bestowed so much grace on me,that I am unable to lift this heavy load.
मैं आ तो गया हूँ ,मगर जानता हूँ कि तेरे दर पे आने के क़ाबिल नहीं हूँ।
I have come to You fully knowing that I am not worthy of coming to You.
जमाने की चाहत में खुद को भुलाया ,तेरा नाम हरगिज़ जुबां पर न लाया।
My strong desire for the world made me forget myself and my lips never uttered Your name.
ख़तावार हूँ मैं,गुनाहगार हूँ मैं,तुम्हें मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।
I am an offender and sinner;I am not worthy of showing my face to You.
तुम्हीं ने अदा की मुझे ज़िंदगानी ,मगर तेरी महिमा मैंने न जानी।
You gave me life, but I did not glorify You in life.
कर्ज़दार तेरी दया का हूँ इतना कि क़र्ज़ा चुकाने के क़ाबिल नहीं हूँ।
I am so indebted to you for Your grace,that I am unable to repay my debt.
ये माना कि दाता है तू कुल जहाँ का,मगर झोली आगे फैलाऊँ मैं कैसे?
I know You are the supreme Provider,yet how can I ask You for anything?
जो पहले दिया है वो भी कुछ कम नहीं है,उसी को निभाने के क़ाबिल नहीं हूँ।
What you have given me already,I am not able to contain.
तमन्ना यही है कि सर को झुका दूँ।तेरा दीद एक बार दिल में मैं पा लूँ।
My only desire now is to bow my head and see You in my heart.
सिवा दिल के टुकड़ों के ऐ मेरे दाता,कुछ भी चढ़ाने के क़ाबिल नहीं हूँ।।
Oh, my Lord! Except for my heart,I have nothing to offer You.
****RADHEY-RADHEY****
जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज के श्रीमुख से अमृत वचन:
जब संसारमात्र ही सदोष है,तो हम कहाँ तक दोष-चिन्तन करेंगे। यदि यह कहो कि क्या करें,दोष-दर्शन स्वभाव-सा बन गया,तो हमें कोई आपत्ति नहीं,तुम दोष देख सकते हो,किन्तु दूसरों के नहीं,अपने ही दोष क्या कम हैं। अपने दोषों को देखने में तुम्हारा स्वभाव भी न नष्ट होगा,तथा साथ ही एक महान् लाभ भी होगा। वह महान् लाभ तुलसी के शब्दों में- ' जाने ते छीजहिं कछु पापी' अर्थात् दोष जान लेने पर कुछ न कुछ बचाव हो जाता है,क्योंकि वह जीव उनसे बचने का कुछ न कुछ अवश्य प्रयत्न करता है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।