Sunday, June 10, 2018

हे श्यामसुन्दर ! थोड़ी सी हमारी भी प्रार्थना सुन लो। हम जो कुछ करते हैं उसको कामादिक महान् चोर क्षण भर में सब चुरा ले जाते हैं। जब हम दिव्य प्रेम की कामना करते हैं तब सांसारिक कामनाएं चित्त को चुरा ले जाती हैं। जब यह सोचता हूँ कि तुम्हारे चरण कमलों में ही ममता करूँगा तब स्त्री पुत्रादि मुझे अपनी ओर खींच ले जाते हैं। मैं जब यह सोचता हूँ कि मैं तो तुम्हारा सेवक हूँ तब दम्भ आकर अधिकार कर लेता है, अर्थात् पाखंड आकर रस में विष मिला देता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अब मैं सभी प्रकार से हार गया। अतएव अपने कृपाकटाक्ष द्वारा बरबस मुझे अपना बना लो।
( प्रेम रस मदिरा:दैन्य-माधुरी )
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
ऊधो!, वे सब जानन हार।
हौं उतनो जानति नहिं जितनो, जानत नंदकुमार।
हम जानति वे अंतर्यामी, सगुण ब्रह्म साकार।
करन विश्व कल्याण नंद घर, प्रकट्यो लै अवतार।
उनके चरित विचित्र न जानत, विधि हरि हर अनुहार।
हम ‘कृपालु’ व्यवधान करें किमि, उन आचरन मझार।।
भावार्थ:– ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! वे सब कुछ जानते हैं। जितना वे जानते हैं उतना हम लोग नहीं जानतीं। हम इतना अवश्य जानती हैं कि वे सर्वान्तर्यामी सगुण साकार भगवान् हैं एवं विश्व–कल्याण के लिए नंद के घर में अवतार लेकर प्रकट हुए हैं। उनकी लीलाएँ कल्याणमयी एवं विलक्षण हैं, जिनके अन्तरंग रहस्य को ब्रह्मा, शंकर सरीखे भी नहीं जान पाते। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में हम लोग उनके कार्यों में बाधक नहीं बनना चाहतीं, वे जो कुछ कर रहे हैं निस्सन्देह ठीक ही होगा।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
भगवान ने दया करके मानव देह दिया और आप लोग जब गर्भ में थे तब वादा किया था की महाराज बहुत दु:ख मिल रहा है माँ के पेट में, गंदगी में, सिर नीचे पैर ऊपर कितना कोमल शरीर, हमको निकालो, आपका ही भजन करेंगे आपको पाने का उपाय खोजेंगे अबकी बार मुझे निकालो । और बाहर आया मम्मी ने कहा ए मेरा भजन कर, पापा ने कहा ए मैं तेरा हूँ । यह सब लोगों ने धोखा देकर बेचारे को बेबकूफ बना दिया, भगवान को दिया हुआ वादा भूल गया और भगवान को छोड़ इन लोगों को भजने लगा । और अगर जागा भी, कोई संत मिल गया और जगा दिया तो कल से करेंगे, अवश्य करेंगे अवश्य । आज जरा काम आ गया कल से करेंगे अवश्य।
तन का भरोसा नहीं गोविंद राधे ।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे ॥
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। 
हमारे श्री महाराजजी के सत्संग में कोई दंभी, तन-मन-धन,प्रतिष्ठा ,गुण,ज्ञान आदि का अहंकार रखने वाला टिक नहीं सकता क्योंकि यहाँ तो प्रत्येक को उसकी सही स्थिति व हैसियत का बराबर एहसास कराया जाता है। इसलिए यहाँ दंभी प्रवेश तो पा जाता है किन्तु टिक नहीं पाता। जब वह दीनता की और अग्रसर होता है तब जाकर यहाँ टिक सकता है। हमारे गुरुदेव को दीन एवं भोले लोग ही अत्यंत प्रिय हैं। कोई कितना ही बड़ा intelligent समझता हो अपने आप को यहाँ श्री महाराजजी के सत्संग में आने के बाद उसको अपना ये खुद को intelligent समझने वाला स्वरूप श्री महाराजजी के निर्दिष्ट साधना सहयोग,एवं कृपा से छिन जाता है,या यूं कहूँ छीन लिया जाता है बरबस। वह जीव दीन-हीन बनने का प्रयास करने लगता है और संसार से वैराग्य स्वत: ही बढ्ने लगता है।जितना-जितना उस जीव का संसार श्री महाराजजी की कृपा से छिनता है,उतना ही वो भगवद क्षेत्र में मालामाल होने लगता है। वो अंदर से परम आनंदित महसूस करने लगता है। चिंताओ का शमन अपने आप गुरुदेव कर देते हैं।वो इसलिए सांसारिकता की दृष्टि से देखा जाये तो यहाँ सत्संग में साधारण जीव ही रह जाते हैं। अहंकार रहता भी है जीव में तो अपने गुरु का अहंकार रहता है बस ,उसको सेवा करने की power अंदर ही अंदर गुरुदेव द्वारा मिलती रहती है,वो महसूस करता है कि एक दिव्य शक्ति सदा उनके साथ उनको आगे बढ़ा रही है,एक एक जीव सौ-सौ लोगों के बराबर बिना थके हुए सेवा कर लेता है।
अहंकार से सख्त परहेज़ है गुरुदेव को.....संसार में तो परम चालाक बनने का उपदेश वो समझाते ही हैं,लेकिन उनके यहाँ चालाकी का काम नहीं। अंदर से दीन-हीन को वे संभालते ही संभालते हैं।किसी को यहाँ सेवा में आने पर पोस्ट का अहंकार हो जाता है,तो उसको भी एक क्षण में गुरुवर उसकी असली स्थिति से परिचय करवा देते हैं।हमारे यहाँ कोई पोस्ट है ही नहीं।अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं है,सब एक साथ दर्शन,एक साथ सत्संग बैठ कर करते हैं,यहाँ तो गरीब-अमीर अंदर की अवस्था पर निर्भर है,भगवद-प्रेम में सेवा में वो भी निष्काम सेवा में कौन-कौन कितना गरीब अमीर है,उसका निर्णय होता है।जो थोड़ा भी श्री गुरुदेव के बताये मार्ग पर चलने की कोशिश कर रहे हैं ईमानदारी से वे अंदर से बहुत कुछ पा चुके हैं,और जो यहाँ भी किसी संसारी स्वार्थवश हैं,वे बेचारे तो अंदर से और गरीब हो गए हैं।
बहुत कुछ है श्री महाराजजी के विषय में लिखने को.......कहाँ तक कहा जाये,कहाँ तक लिखा जाये......कोई अंत ही नहीं। फिर भी आप सभी जिज्ञासुओं की सेवा की कोशिश जारी रहेगी।
जय श्री राधे।

Wednesday, June 6, 2018

हे श्यामसुन्दर ! थोड़ी सी हमारी भी प्रार्थना सुन लो। हम जो कुछ करते हैं उसको कामादिक महान् चोर क्षण भर में सब चुरा ले जाते हैं। जब हम दिव्य प्रेम की कामना करते हैं तब सांसारिक कामनाएं चित्त को चुरा ले जाती हैं। जब यह सोचता हूँ कि तुम्हारे चरण कमलों में ही ममता करूँगा तब स्त्री पुत्रादि मुझे अपनी ओर खींच ले जाते हैं। मैं जब यह सोचता हूँ कि मैं तो तुम्हारा सेवक हूँ तब दम्भ आकर अधिकार कर लेता है, अर्थात् पाखंड आकर रस में विष मिला देता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अब मैं सभी प्रकार से हार गया। अतएव अपने कृपाकटाक्ष द्वारा बरबस मुझे अपना बना लो।
( प्रेम रस मदिरा:दैन्य-माधुरी )
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
श्री हरि एवं उनके भक्तों का संग करने से दिव्य परमानन्द की प्राप्ति होती है जो अनंत मात्रा का अनंत काल के लिए प्रतिक्षण वर्धमान होता है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Radha Rani - one who is worshipped by the Supreme Soul:
Radha Rani is the Divine Governess, Mother and Friend. She incarnates Herself as the Daughter of Mother Keerti and King Bhanu in the village of Barsana. Hence, devotees often address Her as Bhanudulari (daughter of King Bhanu) and Keertikumari (daughter of Keerti). Also known as Shyama, the Princess of Barsana is the ocean of beauty, love and grace.
The face of Kishori Ji (ever-youthful Radha) is like the full moon whosecooling light soothes the hearts of devotees. Her hair is long, luxurious, black and silky; Her eyes, intoxicatingly beautiful. She covers Her golden body with garments, which are the same blue colour as Her Beloved Krishna.
Radha, the bliss-imparting power of Shri Krishna, teaches the lesson of love. No one loves or pleases Krishna like She does. Supremely selfless in Her devotion to Him, She gives no thought to Her own happiness, but only to His. To serve Him is the aim of Her existence and to please Him, Her joy.
So loving and merciful is Radha that She renounces even her Beloved Krishna to rescue the devotee who cries out to Her in desperation.
Rasik saints tell us that even Lord Krishna begs Her for grace, washing Her lotus feet with tears. The name of Radha attracts Him so much that He goes running to the devotee who chants Radhe Radhe. Thus, Radha is not only worshipped by individual souls, but also by the Supreme Soul.
------Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj.
Excerpted from His Discourse "Bhagvat Kripa" (God's Grace and Mercy).
साधक को अपनी शरणागति पर ध्यान देना चाहिए। वैसे आप लोगों को लगता है कि हम पूर्ण शरणागत हैं लेकिन वस्तुतः ऐसा है नही। छोटी सी भी बात आप से कही जाती है, आपका तुरंत उत्तर होता है नहीं हमने तो ऐसा नहीं किया अथवा ऐसा किया तो नहीं था न जाने कैसे हो गया? बाहर से आप मान भी लें लेकिन भीतर से अपनी गलती स्वीकार नहीं करते। गुरु आपके अन्दर की बात नोट करते हैं। वह परीक्षा भी लेता है। और साधक परीक्षा में फेल हो गया तब भी गुरु बारम्बार परीक्षा लेना बंद नहीं करता। जिस कक्षा का जीव है उसी कक्षा का परचा उसको दिया जाता है। अगर आप परीक्षा देने से घबराएंगे तो आप कभी भी भगवद प्राप्ति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार बार बार परीक्षा देते हुए हमें शरणागति को पूर्ण करना है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जो सदा मुझसे युक्त हैं, और प्रेमपूर्वक मेरी आराधना करते हैं, उन्हें मैं वह मेधा (बुद्धियोग) प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझे पूर्ण रूप से प्राप्त करते हैं।
—भगवान् श्रीकृष्ण।
मेरी छैल छबीली राधे,मेरे छैल छबीले श्याम।
मेरी रसिक रँगीली राधे,मेरे रसिक रँगीले श्याम।
मेरी रसिक शिरोमणि राधे,मेरे रसिक शिरोमणि श्याम।
मेरी अति कृपालु हैं राधे,मेरे अति 'कृपालु' हैं श्याम।।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
प्रत्येक आत्मा श्यामसुन्दर का देह है। और जैसे आपका यह प्राकृत देह आपकी ही अर्थात् आत्मा की ही सर्विस करता है, प्रतिक्षण आत्मा को सुख देने के लिये ही संकल्प से लेकर क्रियायें तक करता है। उसी प्रकार श्यामसुन्दर का देह अर्थात् आत्मा भी श्यामसुन्दर का नित्य किंकर है, किन्तु इस आत्मा ने अनादिकाल से देह को आत्मा मान लिया अर्थात् आत्मा को देही नहीं माना, देह मान लिया, इस भ्रम के कारण देह सम्बन्धी विषयों में अर्थात् संसार के पदार्थों को विषय बनाकर, इन्द्रियों के सुखों में लिप्त हो गया और यह क्रम अनन्तानन्त युगों से चला आ रहा है। अगर कभी सौभाग्य से कोई जीव स्व स्वरुप को जान ले अर्थात् ' मैं ' को श्यामसुन्दर का नित्य किंकर रियलाइज करे, विश्वासपूर्वक माने, तो फिर श्यामसुन्दर की प्राप्ति में कुछ भी देर नहीं,कुछ भी साधना की अपेक्षा नहीं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।