Wednesday, October 3, 2018

हे #प्राणेश्वर ! #कुंजबिहारी #श्रीकृष्ण ! तुम ही मेरे #जीवन #सर्वस्व हो । हमारा–तुम्हारा यह #सम्बन्ध सदा से है एवं सदा रहेगा (अज्ञानतावश मैं इस सम्बन्ध को भूल गयी)।तुम चाहे मेरा #आलिंगन करके मुझे अपने गले से लगाते हुए, मेरी #अनादिकाल की #इच्छा पूर्ण करो, चाहे #उदासीन बनकर मुझे #तड़पाते रहो, चाहे पैरों से ठोकर मार-मारकर मेरा सर्वथा परित्याग कर दो। #प्राणेश्वर ! तुम्हें जिस-जिस प्रकार से भी #सुख मिले, वही करो मैं तुम्हारी हर इच्छा में प्रसन्न रहूंगी । ‘#श्री #कृपालु #जी’ कहते हैं कि #निष्काम #प्रेम का स्वरूप ही यही है कि अपनी #इच्छाओं को न देखते हुए, प्रियतम की प्रसन्नता में ही प्रसन्न रहा जाय । अपने #स्वार्थके लिए प्रियतम से बदला पाने की #भावना से प्रेम करना #व्यवहार #जगत का #नाटकीय#व्यापार सा ही है।


#भगवत्कृपा का सबसे #पक्का #प्रमाण#भगवज्जन #मिलन है, #कृपा से #लाभ लेना तभी संभव है, जब इस कृपा को बार-बार #चिन्तन में लाया जाय। भगवज्जन का यदि #दर्शनमात्र#प्राप्त हो जाय तो बार-बार #चिन्तन कर #आनन्द #विभोर होना चाहिए । क्योंकि उसके दर्शन को पाने या #दिलाने की #सामर्थ्य किसी भी #साधना में नहीं है । यदि दर्शन के #अतिरिक्त और भी #सामीप्य मिल जाय फिर तो बात ही क्या है । यदि उस #अमूल्य #निधिको पाकर भी #साधारण #भावना या #चिन्तन रहा तो #महान् #कृतघ्नता एवं #महान् #दुर्भाग्यही होगा, क्योंकि इससे #अधिक हमें क्या पाना #शेष है ।
जो व्यक्ति अनावश्यक अधिक बोलता है, उसी की लड़ाई अधिक होती है। वह स्वयं परेशान रहता है और दूसरों को भी परेशान करता है। अपना परमार्थ भी वह इसी दोष के कारण ही खराब कर लेता है। जो चुप रहता है, गड़बड़ी तो उससे भी होती है,लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पाती। संसार में भी उसको अधिक परेशानी नहीं होती और परमार्थ भी उसका ठीक रहता है।

#मनुष्य दूसरों को #सुधारने के लिये उनके #दोष देखता है और #आलोचना करता है, #परिणाम यह होता है कि दूसरों के #दोषों का #सुधार तो होता नहीं, दोषों का लगातार #चिन्तन करने से वे दोष #संस्कार #रूप से उसके अपने #अन्दर #घर कर लेते हैं, इससे पहले के रहे दोषों की #पुष्टि होती है, उन्हें #बल मिल जाता है। फिर अपने दोषों का दिखना #बन्द हो जाता है, बल्कि कहीं कहीं तो उसमें #अहंकार #बुद्धि हो जाती है, जिससे #पतनका #पथ #प्रशस्त हो जाता है।
जब मनुष्य दूसरे को सुधारने के लिए उसके दोष देखता है, तब #स्वाभाविक ही वह मानता है कि मुझ में दोष नहीं है, #गुण हैं। इससे #गुणों का #अभिमान बढ जाता है। और दोष बढते रहते हैं। जहां अपने दोष #देखने की #आदत छूटी कि फिर उसका #जीवन ही #दोषमय बन जाता है ।
#अनन्तानन्त #जन्मों में अनन्तानन्त स्त्री - पतियों से अनन्तानन्त बार जूते, लात, चप्पल खाकर भी उनसे #वैराग्य नहीं हुआ । #भगवत्सम्बन्धी बातें #पढते#सुनते, मानते हुए भी #मन #हठ नहीं छोडता । तुम्हारी #कृपा के बिना #इन्द्रियों की #विषयासक्ति नहीं छुट सकती । अत: हे #कृपालु ! अपनी अकारण करुणा से मुझे अपना लो । ....... अत: हे #करुणासिन्धु#दीनबन्धु, मेरे #श्रीकृष्ण ! तुम अपनी अकारण #करुणा का #स्वरुप प्रकट करते हुए मुझे अपना लो । मैं तो अनन्त जन्मों का #पापी हूँ किन्तु तुम तो #पतितपावन हो । यही #सोचकर तुम्हारे #द्वार पर आ गया ।

#गुरु की #सेवा #भगवान् की सेवा से बड़ी मानी गई है, हर #ग्रन्थ,हर #शास्त्र में । सेवा तो बहुत #बड़ी #चीज़ है । लेकिन सेवा करने वाले को ये ध्यान रखना चाहिये कि वो सेवा #मनसे हो । हमको ये सेवा मिली है #सौभाग्य से..ये #फीलिंग होते हुये।
कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
(भागवत १०-२९-१५)
#काम#क्रोध#स्नेह#भय किसी भी #भाव से अगर #मन में #भगवान् को लावे, तो उसका मन भगवान् से मिल कर #शुद्ध हो जायेगा। #गंगा जी में प्यार से #यमुना जी मिलें तो भी #प्रयाग से वह गंगा जी कहलायेंगी। और चाहे कोई कुल्ला कर दे #पापात्मा, वो कुल्ला, उसका मुँह से उच्छिष्ट पानी, गंगा जी नदी में मिल गया, अब वो गंगा जी हो गया। इतनी नदियाँ मिलती हैं गोमुख के बाद बंगाल की खाड़ी तक, कितने झरने मिलते हैं, सब गंगा जी बन गए।
गंगा जी गन्दी नहीं होतीं, जो गंगा जी से मिलता है, वो शुद्ध हो जाता है, गंगा बन जाता है।
संसार में भी यह बता रहे हैं।
रवि पावक सुरसरि की नाईं।
अग्नि में तमाम मुर्दे जलते हैं और हवन भी होता है।देवताओं को। अग्नि कहता है, हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा,
जो हमारे अन्दर आएगा, मैं अग्नि बना दूँगा। जला दूँगा।
मैं तो शुद्ध रहूँगा ही। सूर्य कितनी गन्दी चीज़ों में पड़ता है
और शुद्ध वस्तु में भी पड़ता है, लेकिन वो गन्दा नहीं होता। तो, भगवान् या महापुरुष जो शुद्ध हैं,
उससे अशुद्ध व्यक्ति प्यार करेगा, तो वो अशुद्ध शुद्ध हो जायेगा। शुद्ध अशुद्ध नहीं होगा।