Thursday, August 15, 2019

"O Shri Krishna! You have uncountable divine associates, but You alone are my only refuge. I have suffered all kinds of pain in this world. Please listen to my cries."
.........SHRI MAHARAJ JI.
गागरि मोरि मारी काँकरी।
हौं दधि बेचन जाति रही सखि! घूँघट-पट मुख ढाँक री।
तू तो जानति सखी! डगर महँ, परति खोरि इक साँकरी।
मारि दई काँकरि पाछे ते, पुनि लंपट सोँ झाँकरी।
भई विभोर यदपि लखि छलिया, तदपि न मुख ते हाँ करी।
जैसी करी ‘कृपालु’ हरी तस, अब लौं नहि कोउ ह्याँ करी।।
भावार्थ:- एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है अरी सखी! मैं घूँघट काढ़े हुए दही बेचने जा रही थी। तू तो जानती ही है कि मार्ग में साँकरी खोर पड़ती है, वहीं पर श्यामसुन्दर ने मेरे घड़े में पीछे से कंकड़ी मार दी एवं लंपट की तरह मेरी ओर देखने लगा। मैं भी उस छलिया को देखकर यद्यपि विभोर हो गयी फिर भी मुख से कुछ स्वीकार नहीं किया। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखी कहती है कि जैसी अंधेर श्यामसुन्दर ने की, ऐसी आज तक ब्रज में किसी ने नहीं की।
(प्रेम रस मदिरा:- मिलन-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
वे क्या हैं? हम नहीं जान सकते। यह तो केवल वही जान सकता है जिस पर वो कृपा करके बोध करा देते हैं। केवल इतना ही दृढ़ विश्वास बनाए रखो कि वे ही हमारे सर्वस्व हैं। सर्वसमर्थ हैं, सर्वांतर्यामी हैं और इतना ही नहीं वे तो हमारे बिलकुल अपने हैं और सदा से हम पर अकारण करुण हैं।
साधक: महाराज जी, मेरे अंदर तो कोई बुरी आदत नहीं है ?
श्री महाराजजी: 'किसी चीज़ की ख़राबी नहीं' यही ख़राबी है। अपने को अधम पतित गुनहगार मानते हैं संत लोग और तुम कहते हो हमारे अंदर कोई ख़राबी नहीं है। अरे! सबसे बड़ी ख़राबी तो यही है।
RADHAKRISHN ARE THE SOUL OF YOUR SOUL AND ARE ETERNALLY RELATED TO YOU.KNOWING THIS,YOU HAVE TO DEVELOP A DEEP DESIRE TO SELFLESSLY SERVE THEM AND LOVE THEM AND STRENGTHEN YOUR FAITH IN THEM.
-----JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
सोलह से पच्चीस के बीच में गधी भी अपने को अप्सरा समझती है।
ओऽ! लड़के देखो, जितने ये कॉलेज के, यों अकड़ के चलते हैं और यही समझता है हर लड़का-लड़की, मेरे बराबर बस कोई नहीं है।
ये मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसीलिये, उद्धव ने भगवान् से प्रश्न किया कि संसार में मूर्ख कौन है?
उन्होंने कहा, जो अपने को देह मान ले।
बस, इससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं।
जो राधा भाव के साक्षात मूर्तिमान स्वरूप हैं,जो स्वयं महाभाव हैं,जिन के रोम-रोम से श्री कृष्ण प्रेम रस सदा टपकता रहता है,जिन के दिव्य वचन सुनते ही माया अविद्या का जाल सदा-सदा के लिये नष्ट हो जाता है,जो स्वयं प्रेम के सगुण साकार रूप हैं,जिन के अंदर-बाहर श्री कृष्ण प्रेम लबालब भरा है,जो इस धरा पे कृष्ण प्रेम दान करने के लिये अवतरित हुए हैं,ऐसे सहेज सनेही सद्गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु के चरण-कमलों पर बार-बार बलिहार जाने को जी चाहता है।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय।
जय-जय श्री राधे।
Devotion, adoration and loving remembrance of God without desiring any worldly thing from Him is called Bhakti.
#SHRI_MAHARAJJI.
रहो रे मन गौर चरन लव लाई।
जिन चरनन की चरन रेनुकहिं, सेवत श्याम सदाई।
जहँ जहँ चरन परत श्यामा को, तहँ तहँ सिर यदुराई।
चरण पलोटत रज बिच लोटत, भूरि भाग्य जनु पाई।
छिन छिन दृगन लगावत पुनि पुनि, चरनन उर लपटाई।
तुम ‘कृपालु’ कत रहे अभागे, इन चरनन बिसराई।।
भावार्थ:- रे मन! तू भी वृषभानुनंदिनी के उन कमल-कोमल-युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं। जहाँ-जहाँ किशोरी जी के युगल-चरण पड़ते हैं; वहाँ-वहाँ यादवेन्द्र श्रीकृष्ण अपना शीश रखते हैं। उन्हीं चरणों को दबाने एवं उन्हीं चरणों की धूलि में लोटने में अपना परम भाग्य समझते हैं। प्यारे श्यामसुन्दर उन्हीं चरणों को बार-बार अपने हृदय एवं अपने दोनों नेत्रों में लगाकर प्रेम-विभोर हो जाते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ अपने लिए कहते हैं कि तुम इन अमूल्य किशोरी जी के चरणों को भुलाकर क्यों अभागे बने रहे।
(प्रेम रस मदिरा:- सिद्धान्त-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
In this day and age of instant communication, instant food, instant beauty, instant this and instant that, wouldn’t it be nice if a Guru could wave His magic wand and give us instant spiritual experience? Wouldn’t it be great if someone could release us from the clutches of maya by simply giving an embrace, charging a price, breathing a mantra in the ear, or giving benediction? Wouldn't it be wonderful? Wonderful yes, but "Impossible".
......SHRI MAHARAJJI.
हमारे हृदय में श्यामसुंदर हैं , इस फीलिंग ( feeling ) को बढ़ाना है , अभ्यास करो इसका। कभी भी अपने आपको अकेला न मानो बस एक सिद्धांत याद कर लो । हम लोग जो पाप करते हैं , क्यों करते हैं ? अकेला मानकर अपने आपको । हम जो सोच रहे हैं , कोई नहीं जानता । हम जो करने जा रहे हैं कोई नहीं जानता। हम जो झूठ बोल रहे हैं , कोई नहीं जान सकता।