Thursday, December 6, 2018

गुरु सेवा ही धर्म हमारो, दास न हम श्रुतिचारी के।।
गुरु की सेवा ही हमारा धर्म है । हम चार वेद के दास नहीं है । हम उनको नमस्कार करते हैं । तिरस्कार न करना । वेद भगवान् का स्वरुप है, लेकिन वो हमारे बस का नहीं है, हम तैरकर के गंगा को नहीं पार कर सकते इसलिये हमने दस रुपया देकर नाव कर लिया है । नाव में बैठ कर चले जायेंगे ठाठ से 'राधे राधे' करते हुये ... गुरु सँभालेगा । हम केवल शरणागत रहें ।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

The true meaning of the word LOVE (Prem) is to Give, Give, Give. Still not be Proud or complacent about it. The feeling that I have not given enough yet. The highest ideal of such Love was established by Maidens (Gopika) in Holy land of Braj in India for Shri Krishn.
#JAGADGURU_SHRI_KRIPALU_JI_MAHARAJ.
तुम जीव हो, तुम्हारा भगवान् है,वही रिश्तेदार है, सदा साथ रहता है और संसार के रिश्तेदार सदा साथ नहीं रहते और जितनी देर साथ रहते हैं, स्वार्थ को लेकर।
इस पॉइंट को नोट करो। जितनी देर हमारे रिश्ते को निभाते हैं,
कब तक?जब तक स्वार्थ सिद्धि हो।
और भगवान्?
उनको हमसे कोई स्वार्थ हो ही नहीं सकता।क्योंकि वो परिपूर्ण है,आत्माराम पूर्णकाम, परम निष्काम, उनके भक्त हो जाते हैं, उनकी कौन कहे।
तो, वो ऐसे रिश्तेदार हैं,जो हमारे हित के लिये ही सब कुछ करते हैं,
उनका अपना कुछ कर्म है ही नहीं।

#गुरु की #शरणागति में रहकर उन्हीं की #सेवा करते हुये निरंतर #सत्संग किया जाय, तो #श्रद्धा भी स्वयं उत्पन्न हो जायगी । फ़िर #श्रीकृष्ण में #अनुराग भी स्वयं होने लगेगा । यही क्रम बढते-बढते जब #भक्त्ति परिपूर्ण हो जायगी तो संसार से पूर्ण सहज #वैराग्य स्वयं हो जायगा । इतना ही नहीं अन्य ज्ञानादि सब कुछ अनचाहे ही मिल जायगा । यहाँ तक कि सभी प्राप्तव्य पुरुषार्थों का स्वामी श्रीकृष्ण भी उस #भक्त्त के आधीन हो जायगा । फ़िर #जीव#कृतकृत्य हो जायगा।
जीवन की क्षणभंगुरता का विशेष ध्यान रखते हुए एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देना है।

साधना तो करनी ही है जैसे एक छोटा बच्चा बार-बार गिरने पर भी उठकर चलना सीखता है और एक दिन चलना तो क्या दौड़ना भी सीख लेता है, वैसे ही चिरकाल से बिगड़े हुए मन को ठीक करने के लिए चिरकाल तक अभ्यास करना होगा।
#जगदगुरूत्तम_श्री_कृपालु_जी_महाराज
मैया मोहिं, दै दै माखन रोटी।
पग पटकत झगरत झकझोरत, कर गहि यशुमति चोटी।
‘आँ, आँ, करत मथनियाँ पकरत, जात धरणि पर लोटी।
लै निज गोद मातु दुलरावति, कहति ‘बात यह खोटी’|
बिनु मुख धोये हौं नहिं दैहौं, नवनी रोटी मोटी।
खाय ‘कृपालु’ धोइहौं मुख कह, हरि पीतांबर ओटी।।
भावार्थ:– छोटे से कन्हैया अपनी मैया से मक्खन रोटी माँग रहे हैं। अपना पैर पटकते जाते हैं एवं यशोदा मैया की चोटी को हाथ से पकड़ कर पीठ की ओर से झकझोरते हुए वात्सल्य प्रेमयुक्त झगड़ा कर रहे हैं। बाल स्वभावानुसार आँ आँ करते हुए मथानी पकड़ लेते हैं। इतने पर भी जब मैया नहीं सुनती तो मान करते हुए पृथ्वी पर लोट जाते हैं। यह देखकर मैया बालकृष्ण को अपनी गोद में लेकर दुलार करती हुई प्यार से शिक्षा देती है कि पृथ्वी पर लोटना बुरी बात है। फिर मैया कहती है पहले मुँह धो आओ तब मक्खन रोटी दूँगी। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि श्यामसुन्दर भोरेपन में पीताम्बर की ओट से मैया को यह उत्तर देते हैं कि प्रतिदिन की भाँति मक्खन रोटी खाकर मुँह धो लूँगा।
(प्रेम रस मदिरा:-श्री कृष्ण–बाल लीला–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
केवल भगवान् श्रीकृष्ण की ‘ही’ भक्ति करना है,
क्योंकि—
यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः।
प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥
जैसे पेड़ की जड़ में खाद डाल दो, पानी डाल दो, तो पेड़ के तने में, डालों में, उपशाखाओं में, पत्रों में, पुष्पों में, फलों में जल पहुँच जाता है, अलग-अलग पत्ते पे पानी नहीं डालना पड़ता। ऐसे ही, केवल श्रीकृष्ण की भक्ति कर लो, तो सबकी भक्ति अपने आप मान ली जायेगी।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
हमें #कभी भी #मन मे #निराशा नहीं लाना है, #दृढ़ #विश्वास #जमाना है, ये नहीं सोचना है की #साधना करते हुये इतने #दिन हो गये, इतने #साल बीत गये लेकिन #हमारा काम अब तक नहीं बना । ये #सोचिये की अब तो उनके हो गये, उनके #हाथों #बिक गये सब कुछ दे दिया अब time से क्या #मतलब । आज मिले कल मिले #हजार #जन्म बाद मिले या न मिले । हमारा काम उनको अपना मान कर उनकी सेवा की याचना करना । उनकी #विरह में #तड़पते रहना बस हमारी इतनी #ड्यूटि है । इसके आगे सोचना नहीं है, #सोचना #विचारना#बुद्धि लगाना ये #शरणागत का #काम नहीं है ।
मन करु सुमिरन राधा, हैं जीवन धन राधा।
श्यामहुँ स्वामिनी राधा, जय जयति जयति राधा।।
गहु चरण शरण राधा,भव बाधा हर राधा।
चह हरिहुँ कृपा राधा,जय जयति जयति राधा।।

#मुक्ति एवं #बंधन में मध्यस्थ कारण केवल #मन ही है । अतएव हमें मन को ही #ईश्वर के #शरणागत करना है । मन के शरणागत होने पर सबकी #शरणागति स्वयमेव हो जायेगी । हम लोग शारीरिक क्रियादिकों से तो ईश्वर की शरणागति सदा ही करते हैं किन्तु मन की #आसक्ति जगत में ही रखते हैं अतएव मन की आसक्ति के अनुसार जगत की ही प्राप्ति होती है । यह अटल सिद्धांत है कि मन की आसक्ति जहाँ होगी , बस उसी #तत्व की प्राप्ति होगी । यदि हम शारीरिक कर्म अन्य करें एवं मानसिक आसक्ति अन्यत्र हो तो बस मन की आसक्ति का ही फल मिलेगा । अर्थात यदि शरीरेंद्रियों से हम शुभ या अशुभ कर्म करें एवं मन से कुछ भी न करें , केवल ईश्वर- शरणागत ही रहें तो कर्म का फल न मिलेगा , केवल ईश्वरीय लाभ ही मिलेगा । अतएव मन की शरणागति ही वास्तविक शरणागति है । जैसे पैरों को बांधकर मार्चिंग नहीं हो सकती , मुख बंद करके स्पीच नही हो सकती , वैसे ही मन को अन्यत्र आसक्त करके #ईश्वरोपासना भी नही हो सकती । मन की आसक्ति ही #ईश्वरीय क्षेत्र में '#उपासना' कहलाती है एवं जगत क्षेत्र में '#आसक्ति' कहलाती है ।