Saturday, December 19, 2015

God is available only to those who sacrifice some of their time and make the effort to know Him. Lord Krishna is so merciful that He promises to run sixty steps to meet the devotee who takes just one step towards Him. But you have to take that first step yourself. No one can take it on your behalf, nor can you pay another to take it for you.

......SHRI MAHARAJJI.

श्री कृष्ण का माधुर्य रस इतना विलक्षण है कि श्रीकृष्ण स्वंय अपने आप को देखकर मुग्ध हो जाते हैं एवं अपना ही आलिंगन करना चाहते हैं । अतः वे निजजन के ही मनमोहन नहीं हैं , वरन अपने मन के भी मोहन हैं ।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

The stronger your decision that God alone is mine, the more intense will be your desire to meet Him. The more intense your desire, the deeper will be your resolve to do the things that take you closer to Him. The deeper your resolve, the harder you will try. The harder you try, the more grace you will attract and the closer you will come to Him.
.....SHRI MAHARAJJI.

भक्ति रूपी महल दीनता पर ही खड़ा है। जिसे विशेष लाभ प्राप्त करना है उसे दीनता लानी होगी।
-------श्री महाराजजी।

जितनी देर जिस गहराई से मन भगवदीय उपासना में तल्लीन रहेगा , वही भगवदीय उपासना नोट होगी। बाकि सब की सब माया की उपासना में नोट की जायेगी।
.......श्री महाराजजी।

Sunday, December 13, 2015

जग तो है माया का बना , इक हरि ही अपना !
The world is made of maya; only God belongs to you.
----SHRI MAHARAJ JI.
संत एवं श्यामा श्याम हमारे हो चुके -ऐसा विश्वास बार बार दृढ़ करो और हम भी संत एवं श्यामा श्याम के हो चुके -ऐसा निश्चय बार बार करो !
~~~~जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~

जिन्होंने श्री श्यामा - श्याम एवं श्री सीता - राम में अभेद बताया है , इस सिद्धांत को परिपक्व करने के लिए अपने जन्म स्थान स्थित ' भक्ति मंदिर ' एवं श्री धाम वृन्दावन स्थित ' प्रेम मंदिर ' में श्री यादवेन्द्र सरकार और श्री राघवेन्द्र सरकार दोनों के ही श्री विग्रह स्थापित किये हैं ,
ऐसे अनुपम प्रेम के सिद्धान्त को प्रकट करने वाले श्री प्रिया प्रियतम के प्रेम रस रसिक गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम !

जितने समीप आग के कोई जायेगा उतना ही उसका शीत उसकी ठंडक कम हो जायेगी,उतना ही उसका ताप बढ़ता जायेगा। उसी प्रकार हम जितना भगवान के पास भक्ति के द्वारा जायेंगे, उतनी ही भगवतशक्ति हमको मिलती जायेगी और चूँकि भगवान नित्य शांत ,नित्य आनंदमय है इसलिए उसकी शक्ति से हम भी शांत हो जायेंगे।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

The uncontrolled mind is like an enemy. But when we teach it to love God, the mind becomes our best friend.

......JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

Sunday, December 6, 2015

A message from Shri Maharajji......!!!

Dear friend,
Shree Raseshwari Radha Rani and Krishn are your soul beloved and everything to you. Think of Them very closely that They are fully yours. Don't think of Them as almighty God. They are always waiting to embrace you with Their open arms. Just turn your mind away from worldly attractions and attachments and wholeheartedly look to Them once. That is all you have to do. Then They will become yours and you will become Theirs, forever. They are causelessly Gracious and merciful, They don't expect any spiritual practice from you. It's Their nature to Grace causelessly. Just trust Them and entrust yourself in Their hands forever, They will do everything for you. See, in our history They have redeemed great sinners in this world, then why do you have any hesitation? Trust me, do it once, and see for youself......!!!

Yours, Kripalu.
"काम क्रोध मद लोभ तजहु जनि , भजहु तिनहिं दिन रात"।।
अब कामना यह हो की श्याम सुन्दर मुझे कब मिलेंगे? क्रोध यह हो कि उनके मिलन बिना व्यर्थ में जीवन बीता जा रहा है , लोभ यह हो कि उनसे मेरा निष्काम प्रेम बढ़ता ही जाये। मद यह हो कि हम उनके दास हैं। इस प्रकार सभी कामनाओ को श्याम चरणों में समर्पित करने से और रो रो कर उन्हें पुकारने से हमारा अन्तःकरण शुद्ध हो जायेगा।
..........जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
प्रिय मित्रों...!
जय श्री राधे।
यह नीचे फ़ोटो में जो भी weblinks दिये गए हैं वो "जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज'' के दिव्य तत्वज्ञान, उनकी रसमय वाणी, उनके पद, कीर्तन, फ़ोटो, विडियो, इत्यादि से सजी हुई फुलवारी है, जहाँ परम श्रद्धेय श्री सद्गुरु जी की कृपालुता की सुगंधी हैं, उनकी महक है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज इस युग के पंचम मूल जगद्गुरु हैं, जिन्हें काशी विद्वत परिषत द्वारा ''जगद्गुरुत्तम'' की उपाधि से विभूषित किया गया है। आज सारा विश्व उनके द्वारा प्रदत्त अद्वितीय तत्वज्ञान और उनके द्वारा लुटाये गए ब्रजरस को पाकर उनका हमेशा-हमेशा के लिए ऋणी हो गया है। सारा विश्व आज गौरवान्वित है जो ऐसे रसिक संत आज हम सबके बीच में हैं और जिन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण हम पतित जीवों के कल्याणार्थ ही अर्पण कर दिया है, जो हम सबको सबसे बड़ा रस, ब्रजरस और श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा दिलाने को, उनका प्रेम दिलाने को आतुर है, उनकी कृपालुता धन्य है, उनका प्रेम धन्य है, उनका धाम धन्य है, उनकी वाणी धन्य है, उनका रोम रोम धन्य हैं.. वे ऐसे महापुरुष है जो केवल नाम से ही नहीं वरन जिनका स्वाभाव ही स्वभावतः 'कृपा कृपा कृपा' का ही है। ऐसे सद्गुरु की शरण जाकर हम सबको अपनी बिगड़ी संवार लेनी चाहिए। अनंतानत जन्मों से भटकते हम पापी जीवात्माएं आनंद के लिए भटक रहीं हैं, आज उसी आनंद को पाने का एक रास्ता, जो सद्गुरु देव की कृपा से अति ही सरल जान पड़ता हैं, अगर कोई गहराई से सोचे, इन महापुरुष की दया से सहज में ही मिल रहा है, तो क्यूँ न इस पापी और ढीठ मन को एक बार उनके चरणों में झुका दें और और उनका खजाना पा लें, जो अनंत हैं।

इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु आज से साढ़े चार वर्ष पूर्व हमने श्री युगलसरकार की कृपा से हमारे पूजनीय जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के दिव्य ज्ञान को social media पर प्रचारित-प्रसारित करने का संकल्प लिया था। जो आज हरि-गुरु कृपा से बहुत ही सुचारु रूप से चल पड़ा है। हजारों मित्रों को रोज यहाँ से आध्यात्मिक लाभ मिल रहा है।
आप सभी साधकों से विनती है कि इन सभी weblinks में जो की श्री महाराजजी की कृपा से ही प्रारम्भ हुए हैं ,इसमें अधिक से अधिक सत्संगी बहन-भाइयों को जोड़ते रहें। जिससे सभी को श्री महाराजजी के दिव्य तत्वज्ञान का लाभ मिल सके। हमारा एकमात्र उद्देश्य श्री महाराजजी द्वारा प्रगटित दिव्य ज्ञान को जन-जन तक हर घर तक पहुंचाने का है। सभी श्री महाराजजी को जानें...समझे और उनके मार्गदर्शन उनकी बताई गयी साधना पद्धति से अपना अमूल्य मानव देह सफल बनाये।
अगर आपको इन सभी weblinks से जुड़ने पर वास्तविक लाभ होता है तो मन ही मन श्री महाराजजी का ही आभार व्यक्त करें की उनकी कृपा से उनका अमूल्य तत्वज्ञान आपको यहाँ social media पर एक click में उपलब्ध हो रहा है।
इन ग्रुप्स/pages से जुडने से अगर आपको वास्तविक लाभ हुआ है तो वो अनुभव भी आप यहाँ share कर सकते हैं जिससे अन्य साधकों को भी लाभ मिलें।
आप सभी के सुझाव इन weblinks को और बेहतर बनाने के लिए भी आमंत्रित हैं।
**************जय-जय श्री राधे*************
हरि-गुरु को मन में जितनी बार लाओगे उतनी ही मन की गंदगी शुद्ध होगी,और अगर गंदी बातें लाओगे तो मन और गंदा होगा।
......श्री महाराजजी।

कीर्तन में बैठते नहीं हैं और सोचते हैं भगवतप्राप्ति कर लेंगे।
........श्री महाराजजी।

जिस जीव के हृदय मे पश्चाताप है , वह परम उन्नति कर सकता है । परंतु जिसे अपने बुरे कर्मों पर दुःख नहीं होता , जो अपनी गिरि दशा का अनुभव नहीं करता , जिसे समय के व्यर्थ बीत जाने का पश्चताप नहीं , वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान हो , कैसा भी ज्ञानी हो , कितना भी विवेकी हो , वह उन्नति के शिखर पर कभी नहीं पहुँच सकता । जहाँ पूर्वकृत कर्मों पर सच्चे हृदय से पश्चाताप हुआ , जहां सर्वस्व त्याग कर श्री कृष्ण के चरणों मे जाने की इच्छा हुई , वहीं समझ लो उसकी उन्नति का श्री गणेश हो गया । वह शीघ्र ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।

सुप्रीम पावर पूर्णतम पुरुषोतम ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वास्तविक नित्य अनन्त मात्रा के प्रकाश हैं शेष सब अंधकार का स्वरूप हैं। जड़ स्वरूप हो चाहे चेतन हो चाहे कुछ भी हो।
.............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

शरण्य के प्रति जीव की नित्य शरणागति ही साधना है एवं शरणागति द्वारा शरण्य की नित्य सेवा ही जीव का परम-चरम लक्ष्य है।
-------------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

हे श्यामसुन्दर ! संसार में भटकते - भटकते थक गया। हे करुणा वरुणालय ! तुमने अकारण करुणा के परिणामस्वरूप मानव देह दिया , गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सम्मुख हो जाऊँ तथा अनन्त दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा-सदा के लिए मेरी दुःख निवृति हो जाए लेकिन यह मन इतना हठी है कि तुम्हरे शरणागत नहीं होता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अगर कोई सोचता है- मैं अभागा हूँ। यह भगवान अथवा गुरु के प्रति सबसे बड़ी अकृतज्ञता है। कोई समर्थ गुरु मिल गया तो। भगवान की कृपा की तो यह अंतिम सीमा हो गयी।
------श्री महाराजजी।

Sunday, November 1, 2015

हरि-गुरु को अपने साथ महसूस करना ही सबसे बड़ी साधना है। इससे हम अपराधों से भी बचे रहेंगे।
........श्री महाराजजी।
प्रेमी का तो यह ध्येय है कि भले ही हमारे शरीर की बोटी-बोटी समाप्त हो जाये लेकिन बस हमारा इष्टदेव या स्वामी प्रसन्न रहे।
.........श्री महाराजजी।

जितनी देर जिस गहराई से मन भगवदीय उपासना में तल्लीन रहेगा , वही भगवदीय उपासना नोट होगी। बाकि सब की सब माया की उपासना में नोट की जायेगी।
.......श्री महाराजजी।
'गुरु' खोजने से 'गुरु' नहीं मिलते, 'हरि' खोजने से, 'हरि कृपा' से, 'गुरु' मिलते हैं। और इन्हीं 'गुरु' के माध्यम से फिर आपको 'हरि' मिलते हैं।
...........श्री महाराजजी।

जिस जीव के हृदय मे पश्चाताप है , वह परम उन्नति कर सकता है । परंतु जिसे अपने बुरे कर्मों पर दुःख नहीं होता , जो अपनी गिरि दशा का अनुभव नहीं करता , जिसे समय के व्यर्थ बीत जाने का पश्चताप नहीं , वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान हो , कैसा भी ज्ञानी हो , कितना भी विवेकी हो , वह उन्नति के शिखर पर कभी नहीं पहुँच सकता । जहाँ पूर्वकृत कर्मों पर सच्चे हृदय से पश्चाताप हुआ , जहां सर्वस्व त्याग कर श्री कृष्ण के चरणों मे जाने की इच्छा हुई , वहीं समझ लो उसकी उन्नति का श्री गणेश हो गया । वह शीघ्र ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।

वैदवा अनारी, नारी धर भरमावे रे |
जाइ कहो वैदवा सों, कछु दिन पढ़ि आवे,
रोग पहिचाने बिनु, औषधि बतावे रे |
झूठी – मूठी बूटी दै के, घूँटी सों पिलावे मोहिं,
अनुदिन छिन छिन दरद बढ़ावे रे |
एरी सखी ! कैसी करूँ कहाँ चलि जावूँ हाय !
जिऊँ कैसे ? मरूँ कैसे ? विरह सतावे रे |
जान्यो री ‘कृपालु’ तेरो रोग है वियोग को री,
वैदवा है गोकुला में कान्ह जो कहावे रे ||

भावार्थ – ( एक विरहिणी के माता – पिता, उसे रोगग्रस्त समझकर वैद्य को बुलाकर दिखा रहे हैं | उस वैद्य को अल्पज्ञ समझ कर विरहिणी अपनी सखी से कहती है |)
अरी सखी ! वैद्य मूर्ख है एवं मेरी नाड़ी पकड़ कर भ्रम में पड़ रहा है | उस वैद्य से जाकर कह दे कि कुछ दिन और पढ़ आवे क्योंकि वह मेरे प्रेम – रोग को बिना ही समझे – बूझे शारीरिक औषधियाँ बताता है | मेरी इच्छा न होते हुए भी रोग के विपरीत घूँटी के द्वारा झूठी – मूठी औषधि पिलवाता है किन्तु मेरा प्रेम – रोग तो प्रतिक्षण बढ़ता ही जा रहा है | अरी सखी ! तू ही बता कि मैं प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना किस प्रकार रहूँ ? कहाँ चली जाऊँ ? जीऊँ भी तो किस प्रकार ? एवं मरूँ भी तो किस प्रकार ? मेरे लिए विरह अत्यन्त दु:खदाई हो गाय है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! तुझे प्रियतम के वियोग का रोग है, जिसका वैद्य गोकुल वाला श्यामसुन्दर है एवं जिसकी औषधि उसका मधुर मिलन ही है |

( प्रेम रस मदिरा प्रकीर्ण – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
जानि - जानि अपराध करत नित, नेकहुँ नाहिँ लजायो री किशोरी राधे ।
अपनी भक्ति, अपने गुरु, अपने इष्टदेव में श्रद्धा प्रेम बढ़ाने वाली बात जहाँ कहीं से मिले, ले लो। जिससे मिले, ले लो। और जहाँ न मिले या उल्टा मिले बस वहाँ अलग हो जाओ। देर न लगाओ तुरन्त उस व्यक्ति से संबंध ख़त्म कर दो। दुर्जनों का संग त्याग कर सिर्फ़ सत्संगीयों का संग करो।
......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

यदि आपके पास श्रद्धा रूपी पात्र है तो शीघ्र लेकर आइये और पात्रानुसार कृपालु महाप्रभु रूपी जलनिधि से भक्ति-जल भर-भरकर ले जाइए।स्वयं तृप्त होइये और अन्य की पिपासा को भी शांत कीजिये ।
यदि श्रद्धा रूपी पात्र भी नहीं है तो अपने परम जिज्ञासा रूपी पात्र से ही उस कृपालु-पयोधि का रसपान कर आनंदित हो जाइये ।
यदि जिज्ञासा भी नहीं है तो भी निराश न हों । केवल कृपालु-महोदधि के तट पर आकार बैठ जाइये, वह स्वयं अपनी उत्तुंग तरंगों से आपको सराबोर कर देगा । उससे आपमें जिज्ञासा का सृजन भी होगा, श्रद्धा भी उत्पन्न होगी और अन्तःकरण की शुद्धि भी होगी । तब उस शुद्ध अन्तःकरण रूपी पात्र में वह प्रेमदान भी कर देगा ।
और यदि उस कृपासागर के तट तक पहुँचने की भी आपकी परिस्थिति नहीं है तो आप उन कृपासिंधु को ही अपने ह्रदय प्रांगण में बिठा लीजिये । केवल उन्हीं का चिंतन, मनन और निदिध्यासन कीजिये । बस! आप जहां जाना चाहते हैं, पहुँच जाएँगे, जो पाना चाहते हैं पा जाएँगे ।

।। कृपानिधान श्रीमद सद्गुरु सरकार की जय ।।

The path of devotion is free from all conditions of time, place, rituals and manners etc. All that is required is to love Shri Krishna selflessly with a simple heart.
......SHRI MAHARAJJI.

Monday, October 5, 2015

God alone is our supreme divine Master, and therefore, we have to engage ourselves constantly in His divine service.
हमारे सेव्य श्रीकृष्ण ही हैं। सेव्य-सेवक भाव से ही साधना-भक्ति करनी होगी।
..........SHRI MAHARAJJI.

एक बात याद रखो बस, अन्तःकरण का सम्बन्ध भगवान से और गुरु से हो। केवल सिर को पैर पर रख देने से काम नहीं बनेगा,आरती कर लेने से काम नहीं बनेगा,दक्षिणा दे देने से काम नहीं बनेगा। ये सब हेल्पर है। तुम्हारे पास जो कुछ है दो,सब ठीक है। सर्व समर्पण करना है गुरु को ,भगवान को, लेकिन इतने मात्र से काम नही बनेगा। 'अनुराग' सबसे प्रमुख है ,अन्तःकरण से प्यार।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Do not think that since you have not seen Lord Krishna, you cannot visualise Him. Do not worry that perhaps you will make a mistake. The merciful Lord Krishna gives us absolute freedom when it comes to visualising Him. Think Him to be tall or short; imagine Him to be fair, dark or blue. Make His hair short or long; curly or straight. Make Him a child, a teenager or an adult. Give Him a traditional or a modern look. Put heavy ornaments on Him or none at all; the choice is yours. The important thing is to think of Him as you chant.
.......SHRI MAHARAJJI.

A soul very rarely receives a human birth. And that too, is due to God's Grace. Of those who have received a human birth, even rarer are those who are true seekers of God's Love. But just possessing these two is not enough to succeed spiritually unless you also have the association of a true Saint. If all three occur in the same birth, that soul's spiritual success is virtually guaranteed. To this end, the Saint gives many opportunities for his association.
--- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.

संसार प्रत्यक्ष है , यह दिखाई नहीं पड़ता है , आँख से। इसके शब्द सुनाई पड़ते हैं ,कान से।
माँ को देखा , बाप को देखा , बीबी को देखा। उसकी आवाज सुना मीठी - मीठी। कान को मीठी लगी आवाज। उसका स्पर्श किया। ये जो सब विषय मिल रहे हैं प्रत्यक्ष , इससे हमारा मन खिंच जाता है।
और भगवान् के बारे में ? वो तो तुलसी , सूर , मीरा , कबीर , शंकराचार्य , निम्बार्काचार्य , वल्लभाचार्य , लैक्चर दे रहे हैं। किताबों में पढ़ रहे हैं गीता , भागवत , रामायण। सामने तो दिखाई नहीं पड़ते भगवान्।
यह अंतर है। प्रत्यक्ष में जल्दी आकर्षण होता है। वह परोक्ष है भगवान् , इसलिए इमीडिएटली अटैचमेन्ट नहीं हो सकता।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

यह सत्य है कि मन अत्यंत चंचल है किन्तु यदि मन को बार बार समझाया जाय कि श्रीराधा ही तेरी हैं ( सांसारिक नातेदार तो केवल शरीर के हैं और उन नातों का आधार केवल स्वार्थ ही है ) तो धीरे धीरे मन संसार से विरक्त होकर श्री राधा में अनुरक्त हो जाएगा |
-------श्री महाराजजी।

हमारे गुरुदेव काशी विद्वत परिषद द्वारा घोषित 'जगद्गुरुत्तम' पदवी से विभूषित सर्वमान्य 'जगद्गुरु' हैं किन्तु मजे की बात यह है कि हमारे गुरुदेव को किसी ने भी अब तक किसी को भी शिष्य बनाते नहीं देखा,यह भी आजतक उनको किसी से कहते नहीं सुना गया कि 'तू मेरा शिष्य है',या अब से तू मेरा शिष्य हो गया जब की भारतवर्ष में अनेक गुरुओ द्वारा कान फूंकना,मंत्र देना,शिष्य बनाना एक साधारण बात है,साधारण क्या,competition चल रहा है खुले आम। कोई रोकने,टोकने,बोलने वाला नहीं उनको,एक हमारे गुरुवर के अलावा।
हमारे गुरु के दर पर जो भी आये उसका एड्मिशन हो जाता है। डी.लिट।ज्ञानी,विज्ञानी,अंगूठा छाप,टेढ़ामेढ़ा,कोई भी हो कैसा भी हो,सबको एक ही क्लास में एड्मिट कर लिया जाता है।यहाँ अनेक व्यक्ति ऐसे भी हैं जो वर्षों से श्री महाराजजी के सत्संग में आते जाते रहे हैं:साधना हाल क्लास में बैठते रहें,परंतु श्री गुरुदेव को अपना गुरुदेव नहीं माना खूब परखने के बाद ही मन से मानना प्रारम्भ किया कि ये वोही हैं जिनकी हमे तलाश थी,हमारे गुरुदेव हैं।यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि मन से गुरु मानना है,ऊपरी आडंबर से कुछ काम बनने वाला नहीं है। हम जितनी मात्रा में जितने परसेंट गुरु की शरणागति करेंगे उतने ही परसेंट गुरुदेव भी हमे अपनाएँगे। हम 100 परसेंट शरणागति तो करते नहीं और चाहते हैं वो हमे अपना शिष्य मान ले।
वे तो हमारे सदा से सुहृदय हैं,हितकारी हैं,माता-पिता जैसा प्यार तो हमे प्रारम्भ से ही मिलने लगता है,चाहे हम उन्हे गुरु माने या नहीं। रूपध्यान करते हुए भगवन नाम संकीर्तन हम सब की साधना है। 'गुप्त मंत्र' जैसी कोई वस्तु उनके दरबार नहीं है। न ही यहाँ कोई गुरुडम है।हमारे गुरुदेव का कहना है कि किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ भगवत प्राप्त महापुरुष को ही गुरु रूप में धारण करना चाहिये। हम साधको को निजी अनुभव है कि ये वो ही 'श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ भगवतप्राप्त महापुरुष' ही हैं। वे सदा अपने आप को छिपाते हैं,उनको पहचानना कठिन है,किन्तु अपने शरणागत को तो उन्हें अपना स्वरूप उसके अनुरूप दिखलाना ही पड़ता है,उचित वातावरण मिलते ही जन साधारण के बीच भी उनका स्वरूप बरबस प्रकट हो ही जाता है।श्री महाराजजी को सदा 24 घंटे जिसने भी देखा है यही अनुभव है कि किसी न किसी रूप में वे हरि भजन करवा रहे होते हैं। उनके सत्संग में संसार तो एकदम भूल जाता है साधक,हरि-गुरु से ऑटोमैटिक अनुराग,एवं संसार से वैराग्य अपने आप होने लगता है।संसार की सच्चाई स्वत: ही साफ-साफ समझ आने लग जाती है।

वे हमें अपना बनावें चाहे न बनावें इसकी हमें चिन्ता नहीं, हम उन्हें अपना बनाए रहेंगे बस यही निश्चय रहे ।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
वास्तविक महापुरुष से मिलन ही ईश्वर की अंतिम कृपा है। महापुरुष मिलन, ईश्वर मिलन का पक्का प्रमाण है।
--------श्री कृपालु जी महाप्रभु।
World only has miseries stored for us, it's not a negative approach! It's very much positive, as continuous thinking of same with "healthy mindset" leads us on the path of true knowledge and finally towards Devotion. Spasmodic happiness are also bad as when they end they leave behind sorrow. So let us realise the futility of this material arena and excel in devotion.
...........SHRI MAHARAJJI.

Monday, September 28, 2015

Never think about practicing devotion tomorrow. Do not delay. Do not procrastinate when it comes to practicing devotion. It may be billions of years before you get this human life again. Start today, or rather now! Death is certain and it will occur at any moment. Do not wait for old age. Shri Krishna is an ocean of divine love. Surrender completely with your mind just once; He is there to embrace you.
....JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
गुरु - कृपा एवं गुरु - प्रेम कितना मिला बस इसी पर बार - बार विचार करके बार - बार बलिहार जाओ , तभी बात बनेगी।
Your mind itself is the obstacle between you and God,and your mind itself is the medium of finding God.
.......SHRI MAHARAJJI.

जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----श्री महाराजजी।
इसी संसारी कामना ने हमारा अनंत जन्म बिगाड़ा,छोड़ो इसको,नहीं मांगना है, दुःख मिले भोग लो, भगवान से नहीं कहना है,किसी देवी देवता से नहीं कहना है,केवल राधा कृष्ण की उपासना करो नंबर एक,मोक्ष तक की कामना न करो नंबर दो,रोकर पुकारो नंबर तीन और हर जगह हमेशा ये realize करो वो हमारे हृदय में हैं।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Monday, September 14, 2015

सुधार अपने अंदर साधक को स्वयं करना है और भूलकर भी ये न सोचो कि भविष्य में कोई दिव्य शक्ति साधना करेगी। दिव्य शक्ति को जो कुछ करना है वह स्वयं करती है। उसके किए हुए अनुग्रह को भगवदप्राप्ति के पूर्व कोई समझ नहीं सकता। यही गंदी आदत यदि तुरंत नहीं छोड़ी तो नासूर बनकर विकर्मी बना देगी और फिर उच्छृंखल होकर कहोगे सब कुछ उन्ही को करना है। इसलिए तुरंत निश्चय बदलो।
-------श्री महाराजजी।
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भगवान् योग माया के पर्दे में रहते हैं और जीव माया के पर्दे में , अतः भगवान् के साकार रूप में सामने खड़े होने पर हम उन्हें अपनी भावना के अनुसार ही देख पाते हैं !
*****जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*****
Your rise and fall on the Spiritual Path depends entirely on your thoughts,reflections and prevailing attitude.Therefore,always keep your mind occupied with the loving thoughts of God and Guru.Avoid kusanga or Non-Godly association at all costs,Do not talk with or listen to the wrong sorts of people.If you hear anything other than God and Guru,disregard it immediately.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

एक वाक्य रट लीजिये कि रोम-रोम से कि श्यामसुंदर के सुख के लिये ही श्यामसुंदर का दर्शन चाहेंगे,सेवा चाहेंगे,सब चीज उनकी इच्छा के अनुसार,उनकी इच्छा के विपरीत कदापि नहीं।
........श्री महाराज जी।
संसार से वैराग्य इसलिये नहीं है की हमे तत्वज्ञान नहीं है, अत: तत्वज्ञान के सिद्धान्त को सदा ही रीवाईज़(revise) करते रहना चाहिए ।
-------श्री महाराजजी।