Friday, September 23, 2011


अहो हरि ! कब ते द्वार खड़ो |
मांगत भीख कृपा की सिर धरि, कोटिन पाप घड़ो |
यधपि लखि निज ओर दयामय, लाजन जात गड़ो |
तदपि तिहारो विरद सोचि जिय, साहस कछुक पड़ो |
रसिकन सुनि बिनु हेतु सनेही, हौं रिरियात अड़ो |
...
जेतिक पतित ‘कृपालु’ मिले तोहिँ, हौं उन माहिँ बड़ो ||

भावार्थ- हे श्यामसुन्दर ! एक दीन-भिखारी तुम्हारे द्वार पर बड़ी देर से खड़ा-खड़ा कृपा की भीख माँग रहा है | साथ ही अपने सिर पर करोड़ों महापापों का घड़ा भी रखे हुए है | हे दया के सागर ! यधपि जब मैं अपने पापों की ओर देखता हूँ, तो लज्जा के कारण पृथ्वी में गड़ा-सा जाता हूँ तथापि जब तुम्हारे ‘अकारण करुण’ इस विरद पर विचार करता हूँ, तो कुछ साहस अवश्य हो जाता है | महापुरुषों के मुख से सुना है कि तुम बिना कारण ही प्रेम करते हो, इसी विश्वास पर गिड़गिड़ाता हुआ हठपूर्वक तुम्हारे द्वार पर अड़ा हुआ हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तुम्हें आज तक जितने भी पापी मिले हैं, मैं उन सबमें महान् हूँ |

(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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