Wednesday, September 28, 2011




संसार में किसी पर भी विश्वास नहीं करो, किन्तु 'वास्तविक गुरु' की वाणी पर सेंट-परसेंट विश्वास कर लो.

संसार की प्राप्ति में कितना सुख मिलता है और उसके आभाव में कितना दुःख मिलता है , बस यही वैराग्य को नापने का सबसे अच्छा पैमाना है.

हर समय अपने साथ गुरु और भागवान का अनुभव करो. किसी भी समय अपने आप को अकेला महसूस न करो. यही सबसे बड़ी साधना है . जब ऐसा पक्का हो जायेगा तब जब भी ध्यान करने बैठोगे तुरन्त मन लग जायेगा. 


"आनुकूल्यस्य संकल्प: :- गुरु और भगवान के अनुकूल ही सोंचे। उनकी किसी भी बात में,किसी भी क्रिया में प्रतिकूल बुद्धि न होने पाये। वो प्यार करें, डांटे, खार करे, कोई एक्टिंग करें, उलटी भी की तो भी कभी दुर्भावना न होने पावे।

हमारे श्री महाराजजी की वाणी सनातन वेद वाणी है। उनके श्रीमुख से नि:सृत एक-एक शब्द, उपदेश साक्षात भगवान श्री कृष्ण के ही उपदेश हैं। हमें उन्हे विश्वास एवं श्रद्धा से हृदयंगम करना चाहिये।