Monday, September 19, 2011

कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते है . लेकिन जब कोशिश ही कम होती है तब दोष भी कम ठीक होते है .गलती तो सभी से होती है , लेकिन बार बार कहने पर भी गलती हो , यह सबसे बड़ी मिस्टेक है .

शास्त्रों और महापुरुष की वाणी के विरुद्ध जब कभी आपकी बुद्धि का फैसला हो तो यह सोचते रहना चाहिये कि शास्त्र और महापुरुष गलत नहीं हो सकते , हम ही गलत हो सकते है , भले ही इस समय हमारी समझ में न आ रहा हो क्योकि हमारी बुद्धि मायाधीन है

दाद को खुजालते समय तो आराम मालूम होता है पर बाद में, उस जगह असह्य जलन होने लगती है . संसार के भोग में भी ऐसे ही है - शुरू शुरू में तो वे बड़े ही सुखप्रद मालूम होते है परन्तु बाद में उनका परिणाम अत्यंत भयंकर और दुखमय होता है.


बरसात का पानी उची जमीन पर नहीं ठहर पाता, बहकर नीचे जगह में ही जमता है . वैसे ही इश्वर की कृपा भी नम्र व्यक्तियों के ही हृदय में ठहरती है , अहंकार - अभिमानपूर्ण हृदय में नहीं .

- JAGADGURU SHREE KRIPALUJI MAHARAJ.