Saturday, September 24, 2011


मन ! इक दिन ऐसा आयेगा |
जो मुट्ठी बाँधे आया सो, हाथ पसारे जायगा |
जोरि जोरि भल धरहु करोरन, अंत कफन सँग पायगा |
जिन को कहत सपूत तिनहिँ सों, अंत बाँस सिर खायगा |
जब यम कालदंड लै अइहैं, देखि देखि डर पायगा |
... तब ‘कृपालु’ धरि हाथ माथ पर, मन ही मन पछ्तायगा ||

भावार्थ- अरे मन ! एक दिन ऐसा आयेगा जिस दिन, जन्म के समय में जो मुट्ठी बाँधकर आया है वह हाथ पसार कर जायेगा | कोई भले ही जोड़-जोड़कर करोड़ों का धन इकट्ठा कर ले, किन्तु अन्त समय में चार गज कफ़न ही पायेगा | जिनको तू सुपूत कहता है अन्त में उन्हीं के हाथ से सिर पर बाँस की मार खायेगा | जब यमराज काल-दण्ड लेकर आयेगा तब हे मन ! तू देख-देखकर डरेगा | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि उस समय सिर पर हाथ रखकर तू मन ही मन पछतायेगा किन्तु तब कुछ भी काम न बनेगा | अतएव तू श्यामसुन्दर का भजन कर |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.