Tuesday, August 30, 2011

नित सेवा मांगूँ श्यामा श्याम तेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
बढ़ें भक्ति निष्काम नित मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
तोहिं पतित जनन ही प्यारे हैं, हम अगनित पापन वारे हैं!
पुनि कत कर एतिक बेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
यदि कह उन लइ शरणाइ रे, कहू कत पूतना गति पाई रे!
अब बेर न करू करू चेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में!
ये भली है बुरी है जो है तेरी है, तुम भी सोचो सचमुच यह मेरी है!
सोचत ही बनि जाय मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में!
तेरी इच्छा में इच्छा बनाती रहूं, तेरे सुख में ही सुख नित पाती रहूं!
बस चाह इहै इक मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में!
बिनु हेतु कृपालु कहाते हो, पुनि क्यों साधन करवाते हो!
सुनु विनय "कृपालु" जू मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में!

------PANCHAM MOOL JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

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