Sunday, August 28, 2011

चलो मन ! श्री वृंदावन धाम |
जहँ विहरत नागरि अरु नागर, कुँ जनि आठों याम |
भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम |
प्यास लगे तो तरणि-तनूजा, तट पिवु सलिल ललाम |
नींद लगे तो जाइ सोइ रहु, लतन-कुंज अभिराम |
...ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय, तन्मय रहु अविराम |
पै ‘कृपालु’ मन ! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम ||


भावार्थ- हे मन ! तू दिव्य चिन्मय वृन्दावन-धाम में चल, जहाँ लाड़िली और लाल विविध कुंजों में आठों याम विहार किया करते हैं | यदि तुझे भूख लगे तो महापुरुषों की जूठन खाकर सुखी होना | जब प्यास लगे, यमुना का निर्मल जल पी लिया करना | जब सोने की इच्छा हो तब स्वाभाविक बने हुए लताओं के कुंज घरों में सो जाया करना | अरे मन ! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरूप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे मन ! किन्तु यह न भूलना कि इन सब में तेरा भाव निष्काम रहे |

(प्रेम रस मदिरा धाम-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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