Wednesday, August 31, 2011

अनुपम रूप नीलमणि को री |
उर धरि कर करि हाय ! गिरत सोइ, लखत बार इक भूलेहुँ जो री |
प्रति अंगनि छवि कोटि अनंगनि, सुषमा-सुधा-सार-रस बोरी |
जिनहिंन अंगनि नैनन निरखत, तिनहिंन कहँ कह सरस बड़ो री |
नखशिख लखि सखि अँखियन हूँ ते, पलपल तलफति देखन को री |
...कह ‘कृपालु’ गागर महँ सागर, आव न यतन करोर करो री ||

भावार्थ- नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है | जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह ह्रदय पर हाथ रखकर एवं हाय ! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है | उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौंछावर हैं | ऐसी उनकी छवि सौन्दर्य के अमृत के सार के रस में डुबोई हुई है | एक विलक्षणता यह भी है – उनके नख से शिख तक समस्त अंगों को आँखों से देखकर तृप्ति नहीं होती है | उनके जिन अंगों को आँख देखती है उन्हीं अंगों को और अंगों से अधिक सरस अनुभव करती हैं | आँखें प्रतिक्षण पुनः पुनः देखने को तड़पती ही रहती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्राकृत इंद्रिय मन बुद्धि रूपी घड़े में दिव्यानन्द रूपी समुद्र नहीं समा सकता, भले ही कोई करोड़ों प्रयत्न क्यों न करे |

(प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति