Thursday, August 25, 2011

द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे !
मांगत भीख प्रेम की यध्यपि, पात्र संग नहिं लायो री किशोरी राधे !
विष्ठा-विषय हेतु नित अब लौं, शूकर ज्यों भटकायो री किशोरी राधे !
संतन कह्यो नेकु नहिं मान्यो, कियो सदा मनभायो री किशोरी राधे !
जानि जानि अपराध करत नित, नेकहुँ नाहिँ लजायो री किशोरी राधे !
...नर तनु हरि हरिजन अनुकंपा, सब ही पाय गँमायो री किशोरी राधे !
तुम बिनु हेतु कृपालु ‘कृपालुहिं’, पुनि काहे बिसरायो री किशोरी राधे !


भावार्थ- हे गहवर वन विहारिणी राधे ! तुम्हारे द्वार पर एक महान् पापी निष्काम-प्रेम की भिक्षा माँगने आया है, किन्तु साथ में शुद्ध अन्त:करण रुपी पात्र नहीं लाया है | हे किशोरी जी ! अनादि काल से सांसारिक विषय वासना रूपी विष्ठा के लिए अब तक शूकर की भाँति चौरासी-लाख योनियों में भटकता रहा | महापुरुषों के बताये हुए आदेशों को स्वप्न में भी नहीं माना तथा सर्वदा मनमाना ही किया | समझ-बूझ कर भी निरन्तर पापों को करते हुए मुझे जरा भी लज्जा नहीं आयी | मानव-देह, तुम्हारी एवं तुम्हारे जनों की अकारण कृपा, इन सब को पाकर भी खो दिया | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे किशोरी जी ! तुम बिना कारण ही कृपा करने वाली हो, फिर मुझ पतित को क्यों भुला दिया |

(प्रेम रस मदिरा, दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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