Monday, August 29, 2011

कान्ह ! हम सुने तुमहिं भगवान !
साँचु बताउ मोहिं मनमोहन, कहहुँ न काहुहिं आन |
मोहिं परतीति होति नहिं नेकहुँ, हौं तुम कहँ भल जान |
षडैश्वर्य परिपूर्ण सुन्यों हौं, है याकी पहिचान |
तुम्हरे तो एकहुँ नहिं दीखत, पुनि हम लें कत मान |
...मोहिं समुझाउ सौंह तोहिं मोरी, सुनहु सखी ! कह कान्ह |
होत विभोर ‘कृपालु’ प्रेम लखि, रहत न शक्तिहिं भान ||

भावार्थ- एक भोली-भाली सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर ! मैंने सुना है कि तुम्हीं भगवान् हो | हे मनमोहन ! मुझसे सच्ची-सच्ची बात बता दो, मैं किसी से नहीं बताऊँगी | मुझे तो थोड़ा भी विश्वास नहीं होता, क्योंकि मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से भली-भाँति परिचित हूँ | मैंने सुना है कि भगवान् छहों ऐश्वर्यों (समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य) से परिपूर्ण होता है | तुम्हारे भीतर तो इन ऐश्वर्यों में एक भी नहीं दिखाई पड़ता | फिर हमें विश्वास कैसे हो ? यदि तुम सचमुच भगवान् हो तो मेरी सौगन्ध है मुझे समझा दो | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में श्यामसुन्दर ने कहा कि मेरे भीतर छहों ऐश्वर्यों की शक्तियाँ हैं किन्तु भक्तों के प्रेम में मैं इतना विभोर हो जाता हूँ कि मुझे उन शक्तियों का बिल्कुल भान ही नहीं रहता |

(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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