Saturday, August 27, 2011

बलि जाऊँ प्रेम-रस-सार की |
नागर अरु नागरि गुन-आगरि, मूरति रूप सिँगार की |
ललित लवंग-लता-कुंजन महँ, रति-रस सरस-विहार की |
रास विलास-हास-परिहासन, बरसावत रसधार की |
रूप-लुभाने जनु अलसाने, दीवाने दृग-चार की |
...यह ‘कृपालु’ कछु अकथ कहानी, युगल-माधुरी प्यार की ||

भावार्थ- मैं श्री राधाकृष्ण के प्रेमरस-तत्व की माधुरी की बार-बार बलैया लेता हूँ | रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर प्रियतम एवं प्रियतमा प्राणेश्वरी रँगीली राधिकाजी की बार-बार बलैया लेता हूँ | प्रियतम मूर्तिमान रूप के स्वरूप हैं एवं प्यारी श्रंगार स्वरूपा हैं | अत्यन्त मनोहर लवंग की लताओं के कुंज में की हुई निकुंज-लीला माधुरी की बार-बार बलैया लेता हूँ | विविध प्रकार के हास-परिहास से युक्त महारास-रूप दिव्य विलास रस-धार बरसाने की बार-बार बलैया लेता हूँ | प्रिया-प्रियतम के परस्पर रूपमाधुरी के लुभाने एवं अलसाने, प्रेम-दीवाने चारों नेत्रों की बलैया लेता हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि – युगल माधुरी प्यार की बातें मन वाणी आदि से परे की हैं, जिसे राधा-कृपा से युक्त रसिक ही समझ सकता है, दूसरा कोई अधिकारी नहीं |

(प्रेम रस मदिरा प्रेम-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति