Saturday, October 29, 2011

‎'मनुष्य का शरीर' 'श्रद्धा' और 'महापुरुष की प्राप्ति' इन तीन चीजों का मिलना अत्यंत दुर्लभ है।
'मनुष्य शरीर' और 'महापुरुष' मिल भी जाये तो तीसरी चीज 'श्रद्धा' मिलना अत्यधिक दुर्लभ है। अनादिकाल से इसी में गड़बड़ी हुई है। अनंत संत हमें मिलें लेकिन हमारी उनके प्रति श्रद्धा नहीं हुई इसलिए हमारा लक्ष्य हमें प्राप्त नहीं हुआ।
पहले श्रद्धा, उसके बाद साधु संग, फिर भक्ति करो - ये नियम है।

-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।





श्री महाराजजी से एक साधक का प्रश्न:- भजन किसे कहते हैं?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:- प्रेमास्पद की सेवा ही भजन है। सेवा तभी होती है जब प्रीति प्रबल हो, प्रीति तभी प्रबल होती है जब प्रेमास्पद में अपनत्व का भाव प्रबल होता है,अपनत्व के भाव की प्रबलता तभी समझी जाती है, जब अपने सुख की चिन्ता नहीं रहती, केवल प्रेमास्पद की सेवा का ही ध्यान रहता है। यही सच्ची साधना है।