Saturday, February 16, 2013

एक साधक का प्रश्न : जीव का कर्तव्य क्या है ?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर : सभी विवेकी जीवों को यही निश्चय करना है कि हमारा लक्ष्य , हमारे सेव्य श्रीकृष्ण की सेवा ही है ! वह सेवा भी उनकी इच्छानुसार हो ! अपनी इच्छानुसार सेवा , सेवा नहीं है ! वह तो अपने सुख वाली कही जायेगी ! यह सेवाधिकार स्वाभाविक है !

दासभूतो हरेरेव नान्यस्यैव कदाचन

अर्थात समस्त जीवमात्र , अपने अंशी ब्रहम श्रीकृष्ण के नित्य दास हैं ! यह दासत्व ही उनका स्व स्वरूप है ! जिस प्रकार वृक्ष के अंश स्वरूप मूल , शाखा , उप - शाखा , पत्रादि अपने अंशी वृक्ष की नित्य सेवा करते हैं ! अर्थात वृक्ष की जड़े पृथ्वी से तत्व निलाल कर वृक्ष को देती हैं ; शाखा , पत्ते आदि भी सूर्यपात , वायु आदि के द्वारा सेवा करते हैं ! इसी प्रकार जीवों को भी अपने अंशी श्रीकृष्ण की सेवा करनी है ! यही ज्ञातव्य है , यही कर्तव्य है !
एक साधक का प्रश्न : जीव का कर्तव्य क्या है ? 

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर : सभी विवेकी जीवों को यही निश्चय करना है कि हमारा लक्ष्य , हमारे सेव्य श्रीकृष्ण की सेवा ही है ! वह सेवा भी उनकी इक्छानुसार हो ! अपनी इक्छानुसार सेवा , सेवा नहीं है ! वह तो अपने सुख वाली कही जायेगी ! यह सेवाधिकार स्वाभाविक है ! 

दासभूतो हरेरेव नान्यस्यैव कदाचन 

अर्थात समस्त जीवमात्र , अपने अंशी ब्रहम श्रीकृष्ण के नित्य दास हैं ! यह दासत्व ही उनका स्व स्वरूप है ! जिस प्रकार वृक्ष के अंश स्वरूप मूल , शाखा , उप - शाखा , पत्रादि अपने अंशी वृक्ष की नित्य सेवा करते हैं ! अर्थात वृक्ष की जड़े पृथ्वी से तत्व निलाल कर वृक्ष को देती हैं ; शाखा , पत्ते आदि भी सूर्यपात , वायु आदि के द्वारा सेवा करते हैं ! इसी प्रकार जीवों को भी अपने अंशी श्रीकृष्ण की सेवा करनी है ! यही ज्ञातव्य है , यही कर्तव्य है !