Monday, July 21, 2014

सखी तू, उनहिन ओर ढुरे |
मानिनि कहति, सुनो सखि ! ललिता, वे सब भाँति बुरे |
हम उन ते नहिं बात करन चह, वे ऐसे निगुरे |
ऐसे घाव किये उनने जो, कैसेहुँ नाहिं पुरे |
तोरि दियो तृण सम सब नातो, अब नहिं नात जुरे |
सुनत ‘कृपालु’ ओट ते हरि उर, लागत बैन छुरे ||

भावार्थ – मानिनी वृषभानुनन्दिनी ललिता सखी से कहती हैं कि अरी सखी ! तू तो उन्हीं की ओर होकर बात करती है | अरी ललिता ! वे सब प्रकार से बुरे हैं | अब मैं उन निगोड़े श्यामसुन्दर से बात नहीं करना चाहती | उन्होंने हमारे हृदय में ऐसा घाव किया है कि जो किसी भी प्रकार से अच्छा नहीं हो सकता | अब हमारा उनका तो सम्बन्ध नहीं रहा | हमने अपना सम्बन्ध तृण के समान तोड़ दिया है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि श्यामसुन्दर ओट से यह सब सुन रहे हैं | किशोरी जी के कटुवचन उनके हृदय में छुरे के समान लग रहे हैं |
( प्रेम रस मदिरा मान – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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