Wednesday, July 23, 2014

अरी मैं, मरी हरी बिनु हाय |
विरह न रहन देत अब प्रानन, कोउ बचावहु धाय |
बिनुहिं अनल हौं जरी जात हौं, रहे नैन झरि लाय |
कहा करूँ ? कित जाऊँ ? एक छिन, उन बिनु रह्यो न जाय |
तुम प्राणन – ईश्वर प्राणेश्वर !, पुनि कत बेर लगाय |
अब ‘कृपालु’ पिय बेगि मिलहु न तु, हौं ही मिलिहौं आय ||

भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि अरी दैया ! प्यारे श्यामसुन्दर के बिना मेरा तो प्राण निकला जा रहा है | विरह अब प्राणों को लेकर ही मानेगा | हाय ! हाय !! कोई तो दौड़ कर मुझे बचाओ | बिना आग के ही मै जली जा रही हूँ एवं उससे बचने के लिये आँखों से आँसू की वर्षा भी कर रही हूँ ? हाय ! मैं क्या करूँ ? कहाँ चली जाऊँ मुझसे श्यामसुन्दर के बिना तो एक क्षण भी रहा नहीं जाता | हे प्राणेश्वर ! तुम मेरे प्राणों के स्वामी होते हुए भी इतनी देर क्यों लगा रहे हो ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अब शीघ्र ही दर्शन दे दो, नहीं तो प्राण निकल जाने पर मैं स्वयं ही आकर मिल जाऊँगी |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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