Monday, August 11, 2014

बलि जाउँ निकुंज विहार की |
नागरि श्री वृषभानु कुँवरि अरु, नागर नंदकुमार की |
धरि जनु रूप अनूप प्रकट भइँ, मूरति छवि श्रृंगार की |
करत केलि भुज मेलि विविध विधि, बरसावत रसधार की |
संग नवेलिन, अति अलबेलिन, हेलिन यूथ अपार की |
पियत ‘कृपालु’ रसिक निशि वासर, प्रेम सुधा रस सार की ||

भावार्थ – एक सखी कहती है – मैं प्रिया – प्रियतम के निकुंज में विविध प्रकार के रास – विहार की बार – बार बलैया लेती हूँ | मैं प्रेम रस की आचार्या वृषभानुनन्दिनी एवं रसिक शिरोमणि नँदनंदन की बार – बार बलैयाँ लेती हूँ | मानो श्रृंगार एवं रूप की मूर्ति ही साक्षात् राधा – कृष्ण का स्वरूप धारण करके प्रेम के अन्तरंग रसों को बरसाने के लिए अवतरित हुयी है | प्रिया – प्रियतम परस्पर गले में हाथ डाले हुए विविध प्रकार की अन्तरंग लीला विहार करते हुए प्रेम रस को मूसलाधार बरसा रहे हैं, मैं उसकी भी बलैयाँ लेती हूँ | प्रिया – प्रियतम के साथ किशोर अवस्था वाली प्रेमरस की रँगीली अनंत गोपियों के झुण्ड की बार – बार बलैया लेती हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्रेमरस के सार – स्वरूप अमृत को रसिक लोग निरंतर ही पिया करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा निकुंज – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

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