Monday, August 11, 2014

सखी ! पिय, अतिशय सरल सुभाय |
अति कोमल – चित कंत, संत कह, तू कठोर कह हाय !|
पिय निर्दोष रोष जनि करु सखि ! बात और ही आय |
ना जाने वा कुब्जा ने का, जादू – मंत्र चलाय |
मेरी मानि चलहु सब मथुरा, कुब्जहिं भेष बनाय |
तब ‘कृपालु’ हरि उर लगाय अरु, कुब्जा रह खिसियाय ||

भावार्थ – ( एक सखी द्वारा श्यामसुन्दर को कठोर कहने पर दूसरी सखी विरोध करती हुई कहती है - )
अरी सखी ! प्रियतम का स्वभाव तो अत्यन्त सरल है | महात्मा लोग भी कहते हैं कि श्यामसुन्दर का हृदय अत्यन्त कोमल है, फिर तू कठोर क्यों कहती है ? सखि ! श्यामसुन्दर निर्दोष हैं | उन पर क्रोध न कर, इसमें कुछ और ही रहस्य है | मेरी राय में तो उस कुब्जा ने ही मोहिनी – मंत्र पढ़ा दिया है, अतएव मेरी बात मान कर सब लोग कुब्जा का वेश बनाकर मथुरा को प्रयाण कर दो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि आजकल प्रियतम को कुबरी स्त्री बहुत प्रिय है, अतएव वे सबको हृदय से लगा लेंगे और वास्तविक कुब्जा खिसियानी सी देखती रह जायेगी |

( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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