Sunday, August 10, 2014

अली ! यह मुरली बुरी बलाय |
भई बावरी गोपिन डोलति, जनु कोउ मूठि चलाय |
कोउ धावति, कोउ दृग झरि लावति, कोउ करति मुख ‘हाय’ !|
लोक – वेद – कुल – कानि – आनि – तजि, गई कोउ बौराय |
आनन धरे हिरन तृन कानन, नेकु न सकेउ चबाय |
शुक, सनकादि, शंभु आदिक जे, तेउ समाधि भुलाय |
बधिर ‘कृपालु’ करत कत अचरज, जो न ठगोरी आय ||

भावार्थ – एक गोपी कहती है कि यह मुरली तो बुरी बला है | इसकी तान सुनकर समस्त ब्रज – गोपियाँ दीवानी – सी बनकर डोलती हैं | जैसे किसी ने इन पर जादू कर दिया हो | कोई गोपी भागती है, कोई घर से न निकल सकने के कारण आँसू बहाती हैं एवं कोई मुरली की तान सुनते ही अपने मुख से हाय ! हाय !! कहती है | कोई तो लोक परलोक का ध्यान छोड़कर वास्तव में ही पागल हो जाती है | वन में मृग अपने मुख में घास रख कर न तो उसे चबा ही सकते हैं और न उगल ही सकते हैं | बड़े – बड़े ज्ञानी शुकदेव, सनकादिक एवं शंकरादिक भी अपनी – अपनी समाधि भूल गये | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तू बहरा होने के कारण यह आश्चर्य मत कर कि मैं तो मुरली की ठगाई में नहीं आया |
( प्रेम रस मदिरा मुरली - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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