Sunday, August 10, 2014

हरिदासी हैँ मुक्ति सब , सबै जीव हरिदास।
महामूढ़ जो स्वामी तजि , कर दासी की आस।।८७।।

भावार्थ - सभी मुक्तियाँ भगवान् श्रीकृष्ण की दासी हैं और समस्त जीव नित्य दास हैं। जो दास (जीव) अपने स्वामी को छोड़कर दासी (मुक्ति) की आशा करता है। वह महामूर्ख है।
भक्ति शतक (दोहा - 87)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)