Monday, August 4, 2014

श्याम बिनु, भई श्याम हौं वीर |
तनु झुलसत परि विरह – दवानल, धरत न उर अब धीर |
इत हौं विरहिनि जरी जात उत, दृग बरसावत नीर |
याते जरत न बुझत, रहत नित, सुलगत गौर शरीर |
रसिक – शिरोमणि बिनु सखि ! को यह, जानि सके उर पीर |
तनुहिं ‘कृपालु’ श्याम नहिं मनहूँ, श्याम देखु उर चीर ||

भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी ! मैं तो श्यामसुन्दर के बिना श्याम रंग की हो गयी, अर्थात् काली पड़ गयी | विरह की प्रदीप्त अग्नि में प्रतिक्षण जलती रहती हूँ, हृदय में किसी प्रकार से भी धैर्य नहीं आता | एक ओर तो विरहाग्नि मुझे जलाती है एवं दूसरी ओर आँखों से मैं आँसू बरसाती हूँ | इसलिये मेरा यह गौर रंग का शरीर न तो जलता ही है और न बुझता ही है, निरन्तर सुलगता ही रहता है | अरी सखी ! रसिक शिरोमणि प्यारे श्यामसुन्दर के बिना मेरी हृदय स्थित वेदना को दूसरा कौन समझ सकता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! तेरी देह ही श्याम नहीं है वरन् तेरा मन भी श्याम है | यदि तुझे विश्वास न हो तो हृदय फाड़कर देख ले, उसमें काले श्यामसुन्दर बैठे हैं |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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