Monday, August 11, 2014

लगी री मोहिं, श्याम – दृगन की चोट |
पलक न हाय ! पलक – दृग लागत, भये पलक ते ओट |
व्याकुल बिनु अपराध प्रान भये, कीन दृगन ने खोट |
मिल्यो जाय अब मनहुँ दृगन सों, तोरि कानि – कुल – कोट |
अब हौं विलपति प्रति कुंजन, उर, धरे विरह की पोट |
तितनोइ खोट ‘कृपालु’ नंद को, ढोटा, जितनोइ छोट ||

भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि मुझे श्यामसुन्दर की आँखों की चोट ने घायल कर दिया है | अब उनके पलकों से ओट होते ही एक क्षण को भी चैन नहीं पड़ता एवं आँखों की नींद भी चली गयी | यद्यपि लड़कपन या उद्दण्डता मेरी आँखों ने ही की थी, मेरे प्राणों का कोई भी दोष नहीं था | फिर भी ‘और करे अपराध कोउ और पाव फलभोग’ के अनुसार अब प्राण भी अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं | मन ने भी प्राणों से विश्वासघात किया एवं वंश परम्परा के मर्यादा – रूपी किले को तोड़कर आँखों से जा मिला | अब मैं हृदय में विरह का बोझ लिए हुए एवं प्रत्येक कुंज में प्यारे श्यामसुन्दर से मिलन के लिए विलाप करती हुई भटक रही हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हाय ! हाय !! यह नन्द ढोटा जितना ही छोटा है उतना ही खोटा भी है |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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