Monday, November 28, 2011



दयामय ! अपनो विरद विचार |
वेद पुरान बखान अकारन, करुनाकर सरकार |
पुनि तोहिं लगत पतित अति प्यारो, अस कह रसिक पुकार |
हौं अति पतित रहित साधन पुनि, पुनि मतिमंद गमार |
यह बड़ सोच, जान जग मो कहँ, तुम्हरोइ नंदकुमार |
... लाज बचाउ ‘कृपालु’ आपुनिहिं, अपनो जानि निहार ||


भावार्थ- हे दयालु श्यामसुन्दर ! तुम अपने विरद पर विचार करो | सरकार को वेदों-पुराणों में बिना कारण के ही कृपा करने वाला बतलाया है | फिर तुम्हारे संतों ने भी पुकार-पुकार कर यह कहा कि तुम पतितों से अत्यधिक प्यार करते हो | मैं तो अत्यधिक पतित हूँ, फिर साधनहीन हूँ, फिर बुद्धिहीन भी हूँ | मुझे सब से बड़ी चिन्ता यही है कि संसार मुझे तुम्हारा भक्त समझता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अतएव अपनी लज्जा की रक्षा करो, एवं मुझे अपना जान कर एक बार निहार दो |


(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.