Sunday, November 27, 2011




सुनो मन ! एक अनोखी बात |
काम क्रोध मद लोभ तजहु जनि, भजहु तिनहिं दिन रात |
काम इहै पै कब मोहिं मिलिहहिं, सुंदर श्यामल गात |
क्रोध इहै घनश्याम-मिलन बिन, जीवन बीत्यो जात |
रहु येदि मद मदमत दास हौं, स्वामी मम बलभ्रात |
... रह ‘कृपालु’ यह लोभ छिनहिँ छिन, बढ़इ प्रेम पिय नात ||

भावार्थ- अरे मन ! एक अनोखी बात सुन | तू काम, क्रोध, मद, लोभ का परित्याग न कर वरन् इनका दिन रात सेवन कर | किन्तु कामना यह रहे कि श्यामसुन्दर कब मिलेंगे ? क्रोध यह हो कि श्यामसुन्दर के मिले बिना मानव-जीवन समाप्त हुआ जा रहा है | मद यह रहे कि मैं श्यामसुन्दर का दास हूँ एवं वे मेरे स्वामी हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि लोभ यह रहे कि श्यामसुन्दर के युगल चरणों में प्रत्येक क्षण प्रेम बढ़ता जाय |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.