Sunday, November 27, 2011



होति जग इक अनहोनी बात |
जो नहिं होइ सक तीनि काल महँ, सोइ जग हो दिन रात |
रसिकन कह सिगरो जग दुलहिनि, दूलह श्यामल गात |
दूलह रस बिनु नीरस दुलहिनि, रस नहिं पाय सकात |
पै जग लखु सब दुलहिनि दुलहिनि, दुलहिनि की बनि जात |
... जो ‘कृपालु’ यह जान मरम सो, जोरत हरि सोँ नात ||

भावार्थ- संसार में एक ऐसी अनहोनी बात है जो सदा होती रहती है | वस्तुत: जो त्रिकाल में भी असम्भव है, वही बात दिन-रात हो, यह कितना बड़ा आश्चर्य है | रसिकजन कहते हैं – समस्त जीवात्माएँ परमात्मा श्यामसुन्दर की दुल्हन-स्वरूपा हैं | यह सर्वविदित है कि दुलहा श्यामसुन्दर दिव्य रस का भण्डार हैं एवं दुल्हन जीवात्मा अनादि काल से मायाधीन होने के कारण आनन्द-रस से वंचित है | अतएव सिद्ध हुआ कि बिना श्यामसुन्दर-रूपी प्रियतम की प्राप्ति के जीवात्मा-रूपी दुल्हन स्वप्न में भी आनन्द प्राप्ति नहीं कर सकती | किन्तु संसार का आश्चर्यमय कार्य देखो | एक दुल्हन जीवात्मा दूसरी दुल्हन जीवात्मा की दुल्हन बन जाती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जो इस रहस्य को जान लेता है वह तत्काल मायिक संसार से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में अनुरक्त हो जाता है |

(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.