Thursday, May 8, 2014

यह मौन काल ली, का लली ?|
अति उदास नहिं भूख प्यास कछु, योगिनि की गति का चली ?|
चितवनि, हँसनि, गवनि सब भूली, कोउ छलिया तोहिं का छली ?|
झर झर झर दृग झर जनु निर्झर, विरहागिनि महँ का जली ?|
यह काली करतूति लगति मोहिं, जाके काली कामली |
मोहिं ‘कृपालु’ क्यों नाहिं बतावति, हमहुँ सगी नहिं का अली ||

भावार्थ – विरहिणी किशोरी जी से एक अन्तरंग सखी कहती है कि हे किशोरी जी ! क्या तुमने कल से मौन धारण कर लिया है ? तुम अत्यन्त उदास रहती हो, तुमने खाना – पीना भी छोड़ दिया है | क्या योगाभ्यास कर रही हो ? तुम्हारा देखना, हँसना, चलना सब छूट सा गया है | क्या तुम्हें किसी ठग ने ठग लिया है ? तुम्हारी आँखों से झरने की तरह दिन – रात आँसू निकला करते हैं | क्या तुम्हारे हृदय में विरह की आग लग गयी है ? मुझे तो काली कमली वाले श्यामसुन्दर की ही यह करामात दिखती है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखी कहती है कि अरी सखी ! तू मुझसे इस रहस्य को क्यों छिपाती है | क्या मैं तुम्हारी सगी नहीं हूँ ?

( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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