Friday, May 9, 2014

आजु सखि ! ह्वै गयो नैना चार |
हौं दधि बेचन जाति वृंदावन, देख्यों नंदकुमार |
सो छवि लखत बनत, नहिं वरनत, रूप – माधुरी – सार |
तन – मन – प्रान निछावरि करि मैं, लियो मोल रिझवार |
पुनि – पुनि कह्यो ‘हमारी प्यारी’ सुनि – सुनि गइ बलिहार |
कत ‘कृपालु’ बलि जात नंद को, कै गयो बंटाढार ||

भावार्थ – ( एक गोपी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मिलन एवं उसकी अपनी सहेली से बातचीत |) अरी सखी ! आज में वृन्दावन की ओर दही बेचने जा रही थी | अचानक ही मार्ग में प्यारे श्यामसुन्दर दिखाई पड़े और उनकी आँखों से हमारी आँखें चार हो गईं | अरी सखी ! वह रूप – माधुरी देखते ही बनती थी, वर्णन करने में नहीं आ सकती | मानो सौन्दर्य की मधुरता का सार निकालकर वह छवि बनी हुई हो | मैं भी उस छवि पर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व न्यौछावर करके सदा के लिए उनकी बन गई | उसने बार – बार मुझसे ‘हमारी प्यारी’, ऐसा कहा | मैं इस शब्द को सुनकर प्रेम में विभोर हो गई | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! तू नाहक ही इतने अधिक आनन्द में मग्न हो रही है, उस छलिया नन्दकुमार ने तो तेरा लोक – परलोक सभी चौपट कर दिया, क्योंकि अब तू सदा ही उसके मधुर – मिलन के लिए तड़पा करेगी |
( प्रेम रस मदिरा मिलन - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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