Thursday, March 7, 2013

साधूनां दर्शनं तिर्थभूता ही साधवः।
कालेन फलते तीर्थं सद्य साधुसमागमः।।

साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरुप है, उनके दर्शन से ही पुण्य होता है।साधुओ में और तीर्थो में एक बड़ा भारी अंतर है,तीर्थो में जाने का फल तो कालांतर से मिलता है,किन्तु साधुओ के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है.।अतः सच्चे साधुओ का सत्संग तो बहुत दूर की बात है , उनका दर्शन ही कोटि तीर्थो से अधिक होता है।

The body of the saints are just like a pilgrim. The only darshan of a true saint equalizes Punya(Good Deeds) of that obtained from going to a pilgrims. The most important difference between the saint and pilgrims is that the fruit of going to pilgrims will be obtained after long long time but the benefit or fruit of saints company will be obtained immediately. Therefore only the darshan of true saints have more fruit or good deeds than that of going to the pilgrims.
साधूनां दर्शनं तिर्थभूता ही साधवः।
कालेन फलते तीर्थं सद्य साधुसमागमः।।
 
साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरुप है, उनके दर्शन से ही पुण्य होता है।साधुओ में और तीर्थो में एक बड़ा भारी अंतर है,तीर्थो में जाने का फल तो कालांतर से मिलता है,किन्तु साधुओ के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है.।अतः सच्चे साधुओ का सत्संग तो बहुत दूर की बात है , उनका दर्शन ही कोटि तीर्थो से अधिक होता है।

The body of the saints are just like a pilgrim. The only darshan of a true saint equalizes Punya(Good Deeds) of that obtained from going to a pilgrims. The most important difference between the saint and pilgrims is that the fruit of going to pilgrims will be obtained after long long time but the benefit or fruit of saints company will be obtained immediately. Therefore only the darshan of true saints have more fruit or good deeds than that of going to the pilgrims.