Monday, August 19, 2013

प्रीति की रीति न सखि सब जान |
जो मन रह रत सुत वनितनि पति, सो न सकत पहिचान |
पुनि जो मन रह रत श्रुति कर्मन, सोउ मन जान अयान |
पुनि सोउ मन नहिं जानि सकत जो, निरत मुक्ति हित ज्ञान |
जो मन लोकन वेदन मुक्तिन, ह्वै विरक्त भज कान्ह |
सोइ ‘कृपालु’ तिन अनुकंपा ते, प्रीति - रीति उर आन ||

भावार्थ - अरी सखी ! प्रीति की रीति को बिरले ही जानते हैं | जो मन स्त्री, पुत्र, पति आदि में आसक्त रहता है वह नहीं समझ सकता, जो मन वेद - विहित कर्म धर्म में आसक्त रहता है वह भी नहीं समझ सकता | और वह भी नहीं समझ सकता जो अद्वैत - ज्ञान के द्वारा मुक्ति में आसक्त है | जो मन लोक - वेद एवं मुक्ति आदि से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में आसक्त होता है, ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, वही मन श्यामसुन्दर की अनुकम्पा से प्रीति की रीति को जान सकता है |


( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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