Wednesday, June 12, 2013

हमारो, कान्ह प्रान को प्रान |
आजु सखी ! हौं करन गई रहि, यमुना महँ असनान |
तहँ दुर्वासा मरम बतायो, दै वेदादि प्रमान |
मुनि इमि कह इंद्रिय मन बुधि कहँ, जिमि प्रिय प्रान बखान |
तिमि इन प्रानन प्रान जान उन, सुंदर श्याम सुजान |
कह ‘कृपालु’ तबही सखि ! लागत, प्रानन प्यारो कान्ह ||

भावार्थ – हमारे श्यामसुन्दर आत्मा की भी आत्मा हैं | अरी सखी ! आज मैं यमुना – स्नान करने गयी थी, वहाँ दुर्वासा मुनि ने वेदादिकों के प्रमाण द्वारा यह रहस्य बताया | उन्होंने कहा जिस प्रकार इन्द्रिय, मन, बुद्धि को प्राण अर्थात् आत्मा, अपने से भी अधिक प्रिय है, उसी प्रकार आत्मा को भी, आत्मा की आत्मा – परमात्मा अर्थात श्यामसुंदर अधिक प्रिय हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अरि सखी ! इसी कारण से श्यामसुन्दर प्राणों से भी अधिक प्यारे लगते हैं | यह रहस्य आज समझी |

( प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
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