Tuesday, June 25, 2013

जिमी हो शीत निवृत्त तिन , जिन ढिग अगिनि सिधार |
तिमि हो कृपा तिनहिं जिन , मन जाये हरि द्वार ||३०||

भावार्थ – जिस प्रकार आग के पास जाने से ठंड चली जाती है , उसी प्रकार जिसका मन श्रीकृष्ण की शरण में चला जाता है , उस पर श्रीकृष्ण की कृपा हो जाती है |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |