Tuesday, June 17, 2014

हम आनंद रुपी भगवान् के अंश हैं।
तो ये सब बेचारे भिखमंगे हैं। इनके पास प्रेम नहीं है ये स्वार्थ के लिये प्रेम करते हैं। और जहाँ स्वार्थ है , वहॉँ का। प्रेम प्रेम है ही नहीं। क्योंकि स्वार्थ काम सिद्ध हुआ तो प्रेम घट गया। स्वार्थ बिलकुल नहीं सिद्ध हो रहा है प्रेम खतम हो जाता है। उसकी आधारशिला गलत है इसलिये वो प्रेम टिकाउ कैसे रहेगा।
चाहे माँ का प्रेम हो , चाहे बाप का , चाहे बीबी का , चाहे किसी वस्तु का हो। तो सबसे प्रिय वस्तु आत्मा है। आत्मा से वैराग्य किसी को नहीं होगा। देखने का , सुनने का , सूंघने का रस लेने का सामान क्यों चाहते हो। केवल एक कारण है , आत्मा को सुख मिलता है। तो आत्मा का सुख क्यों चाहते हो ?
उसका कोई कारण नहीं जानते हम कि हम आत्मा का सुख क्यों चाहते हैं।
दूसरे का सुख क्यों नहीं चाहते अपनी आत्मा का सुख क्यों चाहते है ? इसलिये चाहते हैं कि हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।

-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।