Friday, September 7, 2012



"अरे कृतघ्न मन! धिक्कार है तुझे! जिसने तुझ नीच,अकिंचन व अधम को अपने श्रीचरणों में स्थान दिया, तूने उस शरण्य की कृपा को भुला दिया। उनको ही दुखी करने लगा। सच है जहाँ कृपालुता, क्षमाशीलता की पराकाष्ठा है, वहीं तूने अधमता व अपराधशीलता की पराकाष्ठा की है। क्यों न आज से तू अपने प्यारे प्रभु को ही प्रसन्न करने का एक मात्र बीड़ा उठाकर चल।"

No comments:

Post a Comment