Tuesday, September 11, 2012

किशोरी मोरी, करहु कृपा की कोर |
बहुविधि नाच नचावति स्वामिनि !, यह माया बरजोर |
काम क्रोध अरु लोभ मोह मद, घेरे चहुँ दिशि चोर |
जानतहूँ नहिं मानत ठानत, हठहिँ हठी मन मोर |
सुत वित नारि पियारि लगति अति, यदपि कहावत तोर |
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ताते दै निज प्रेम ‘ कृपालुहिं ’, हेरहु हमरिहुँ ओर ||


भावार्थ - हे किशोरी जी ! मुझ पर कृपा दृष्टि करो | यह प्रबल माया मुझे अनेक प्रकार के नाच नचा रही है | काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये बड़े-बड़े शत्रु चारों ओर से घेरे हुए हैं | सब कुछ जानते हुए भी यह हठीला मन दुराग्रह के कारण नहीं मानता, संसार की ओर ही जाता है | यधपि मैं तुम्हारा कहलाता हूँ फिर भी धन, पुत्र, स्त्री आदि से प्यार करता हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं इसलिए एक बार हमारी ओर भी देखकर, अपना विशुद्ध प्रेम देकर कृतार्थ करो |


(प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.