Thursday, March 5, 2015

The Real Significance of Holi by Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj......!!!

अधिकतर लोग यही समझते है की रंग,गुलाल से खेलना,हुडदंग बाजी करना,तरह तरह के स्वादिष्ट व्यंजन खाना यही होली मानाने का तात्पर्य है। वास्तव में होली का पावन पर्व श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति का पर्व है। होली मनाने का अभिप्राय ही है की प्रह्लाद चरित्र को समझते हुये उनके भक्ति संबंधी सिद्धांतो का अनुसरण करना।
अतः होली मनाने का सर्वश्रेष्ठ ढंग यही है की रूपध्यान युक्त श्री राधा कृष्ण नाम,रूप, लीला,गुण,धाम,जन का गुणगान करुणक्रन्दन करते हुये किया जाये।
भक्त प्रह्लाद की परम निष्काम भक्ति एवं उनके दृढ़ विश्वास के कारण भगवान ने खम्भे से प्रकट होकर यह सिद्ध कर दिया ही मैं सदा सर्वत्र सामान रूप में व्याप्त हूँ। अतः हमे हरि-गुरु को सदा अपने रक्षक और निरीक्षक रूप में अनुभव करते हुये ये चिंतन करना है की सदा हमारी रक्षा करते है और करेंगे। वे ही हमारे परम हितेषी है।
यदि कहू वर मांगो गोविन्द राधे।
वर मांगू मांगने की कामना मिटा दे।।

यह पर्व निष्काम प्रेम का सन्देश प्रसारित करते हुये महाराजजी भक्तशिरोमणि प्रह्लाद चरित्र का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते है। मोक्ष पर्यन्त की कामनाओ का परित्याग करके युगल प्रेम कामना ही शेष रह जाये।
यह होली पर्व के महत्व को प्रतिपादित करता है। प्रह्लाद ने असुर बालको को यही उपदेश दिया -तन का कोई भरोसा नहीं है कब यमदूत आ जाये। अतः युवावस्था को भी न परखते हुये शीध्रातिशीध्र हरि को अपना बना लो। बार बार सोचो की वे ही मेरे सर्वस्व है, उन्ही के साथ मेरे सारे सम्बन्ध है।
जय-जय श्री राधे।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय हो