Tuesday, March 10, 2015

हाय दई, यह कैसी भई री |
केहि विधि कासों कहूँ आपनी, जार प्रेम की बात नई री |
देखन को छोटा अति खोटा, नँद – ढोटाहिं ठगाय गई री |
भई लटू मैं भटू पटू ह्वै, नेकु हँसनि मन बेच दई री |
पलक शब्द विपरीत भयो अब, विष – बेलरि उर माहिं बई री |
सिगरो जन सूनो सो दीखत, विरह घटा नैनन उनई री |
यह ‘कृपालु’ पिय – प्रेम विषामृत, परम चतुर दै शीश लई री ||

भावार्थ – एक विरहिणी सखी से कहती है कि हाय ! यह तो बड़ा ही बुरा हुआ | अब इस परपुरुष – रूप श्यामसुन्दर के प्रेम की बात को किस प्रकार किसी से कहूँ | देखने में तो वह नन्द का लाल छोटा ही है, किन्तु वह इतना खोटा है कि मुझ अत्यन्त चतुर को भी ठग लिया | अरी सखी ! मैं चतुर होते हुए भी थोड़ी – सी मुस्कान के ऊपर अपने मन को बेचकर उस पर दीवानी हो गयी | अब हमारे लिए एक – एक पल कल्प के समान हो गया है ( पलक शब्द का उल्टा कलप ) एवं हृदय में विरह की विष – बेल फैल गई है | मुझे सारा संसार शून्य – सा प्रतीत होता है, एवं विरह के बादल आँखों से आँसू बरसा रहे हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! यह विष एवं अमृत मिला हुआ प्रेम जो तुझे मिला है वह बड़े – बड़े ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है | इसको पाने कि लिए तो अत्यन्त ही चतुर अपना शीश प्रदान करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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