Tuesday, March 25, 2014

विश्वास बढ़ाओं।
तदर्थ बार - बार चिन्तन आवश्यक है। चिन्तन गुरु एवं इष्टदेव की कृपा का करना है। कृपा केवल दर्शन मात्र की ही पर्याप्त है। एक क्षण भी कृपा के विपरीत न सोचो।
कभी भी अकेले न रहो। सदा उन्हें अपने साथ मानो। रोम - रोम में प्रियतम के स्पर्श का चिन्तन करो।
करके देखो।
………जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।