Thursday, August 3, 2017

भगवान् की भक्ति ‘ही’ करना है,‘भी’ नहीं करना है,‘भी’ तो हम बहुत कर चुके।
हम वहाँ भी और वहाँ भी,सब जगह सिर झुका रहे हैं और तर्क क्या देते हैं—

यानि कानि च मित्राणि कर्तव्यानि शतानि च।
तमाम दोस्त बनाये रखना चाहिये,मुसीबत में पता नहीं कौन काम आवे,कौन न आवे।दो-चार वकील भी रहें हमारे परिचित,दो-चार डॉक्टर, दो-चार...।
सब इसी प्रकार से।ऐसे ही भगवान् के बारे में विश्वास नहीं है,तो इसलिये उन देवता के पास भी जाते हैं,वहाँ भी जाते हैं, वहाँ भी जाते हैं और क्या माँगते हो?
हमारे देश में जितनी ये भजन और आस्तिकता दिख रही है, सब धोखा है।
संसार माँगने जाते हैं लोग।ओऽ तिरुपति के मन्दिर में लाइन लगी है, हर महीने कई करोड़ की भेंट चढ़ती है।
क्यों? किसलिये?हमको कलेक्टर, कमिश्नर बना दिया जाये,हमारे बेटा हो जाये, ये संसारी कामनाओं को लेकरभगवान् के यहाँ भीड़ हो रही है।
वैष्णो देवी जा रहे हैं। हमारी सुन लिया।अच्छा, सुन लिया तुम्हारी? हाँ-हाँ। अच्छा। फिर हमारा लड़का सीरियस बीमार हुआ।
अरे! फिर चलो, सुन लेंगे वो।फिर गये।रास्ते में थे, तभी वो मर गया।
अरे! ये क्या हुआ? ये सब धोखा है जी, कहीं कुछ नहीं है,
उसके चार लड़के थे, पाँचवा हो गया,हमारे एक था, वो मर गया,ये क्या है देवी-देवता, भगवान्, सब बेकार! नास्तिक हो जायेगा वो।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।