Monday, April 10, 2017

माय ! अस गुड़िया मोहिं बनाय |
जाकी निरखि सुघर सुंदरता, गुड़रा जिय ललचाय |
भूषन – वसन पिन्हाउ वाय अस, जस कहुँ सखिन न पाय |
पुनि बनाउ अस सुंदर गुड़रा, लखि गुड़िया मनभाय |
नख शिख करि श्रृंगार दुहुँन सिर, सेहरा देउ बँधाय |
कह ‘कृपालु’ तब कुंवरि सखिन लै, दोउन ब्यावहु कराय ||

भावार्थ – छोटी सी किशोरी जी कीर्ति मैया से कहती हैं – “ मैया ! मुझे ऐसी बढ़िया गुड़िया बना दे जिसकी सुन्दरता देख कर गुड्डे का मन ललचा जाय | और मैया ! इस गुड़िया को ऐसे कपड़े एवं गहने पहिना दे जो सखियों को कहीं न मिलें | फिर मैया गुड्डा भी इतना ही सुन्दर बना दे कि उसे देखकर गुड़िया का मन ललचा जाय | दोनों का नख से शिख तक सुन्दर श्रृंगार करके, दोनों को सेहरा बाँध दे |” ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – “हाँ मैया ! ऐसा कर दे, तब हमारी छोटी – सी किशोरी जी सखियों को लेकर गुड़िया – गुड्डा का ब्याह रचायेंगी |”
( प्रेम रस मदिरा श्री राधा – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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