Friday, July 26, 2013

ब्रह्म एक मधु रूप है , एक भ्रमर उनमान |
एक रूप रस देत है , एक आपु कर पान ||५२||

भावार्थ – रस स्वरुप ब्रह्म के दो स्वरुप होते हैं | एक रस रूप | दूसरा रसिक रूप | अर्थात एक मधु के समान | दूसरा भौंरे के समान | एक रूप से स्वयं रस पान करते हैं | दूसरे रूप से जीवों को भी वही रस पान कराते हैं |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |