Saturday, November 19, 2016

कहूँ का, वा दिन की सखि ! बात |
जा दिन देखी नँदनंदन छवि, मंद मंद मुसकात |
जिन अँखियन देखी सखि ! सो छवि, सोऊ कहि न सकात |
अंग – अंग प्रति रूपमाधुरी, लखि अनंग सकुचात |
देखतहूँ नहिं देखति सखि ! इन, अँखियन जल भरि जात |
बिनु देखेहूँ सखि ! ‘कृपालु’ मोहिं, इक पल कलप लखात ||

भावार्थ - एक सखी अपनी अंतरंग सखी से अपने प्रथम मधुर मिलन की बात बताती हुई कहती है, अरी सखी ! उस दिन की क्या बताऊँ जिस दिन मैंने श्यामसुन्दर की मन्द मन्द मुस्कुराती हुई मनोहर छवि को देखा | मैं तो क्या, जिन आँखों ने उस रूप को देखा है वे भी नहीं बता सकतीं | उनके प्रत्येक अंग का सौन्दर्य कामदेव को लज्जित कर रहा था और फिर मैंने तो सखी, देखते हुए भी नहीं देखा क्योंकि देखते समय इन आँखों में आनन्दाश्रु की धारा बहने लगी थी | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में बिना देखे भी उनके वियोग में विरहाश्रु बहाती हुई, एक – एक क्षण कल्प के समान बिता रही हूँ |
( प्रेम रस मदिरा मिलन – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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