Friday, July 8, 2016

बताऊँ, तो कहँ सखि ! का बात |
सुनहु सखी ! ललिता, वाकी कछु, बात कही नहिं जात |
कहत मधुर बोलनि मो ते अस, ‘तुम ही सों मम नात’ |
पै विहरत चंद्रावलि घर वह, नेकहुँ नाहिं लजात |
कह्यो कालि अइहौं अध रातिहिं, करिहौं तव मनभात |
नहिं आयो ‘कृपालु’ परखत रहि, तलफत बीती रात ||

भावार्थ – मानिनी वृषभानुनन्दिनी ललिता सखी से कहती हैं कि अरी सखी ! मैं तुझसे क्या बात बताऊँ | उस छलिया की कुछ बात कहने योग्य ही नहीं है | वह बड़े मधुर बोल से मुझसे कहता है कि मेरा प्रेम एकमात्र तुम्हीं से है किन्तु चन्द्रावली के घर में नित्य विहार करने जाया करता है | उसको थोड़ी भी लज्जा नहीं है | कल उसने मुझसे कहा कि मैं अर्द्धरात्रि में आऊँगा एवं तुम्हारा मनभाया करूँगा | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में किशोरी जी कहती हैं फिर भी वह नहीं आया, मैं परखती रही एवं पूरी रात तड़पती रही |
( प्रेम रस मदिरा मान – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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