Friday, December 2, 2016

पिया बिनु, उठति हूक हिय हाय |
साँवरि सूरति, मोहिनि मूरति, मो मन गई समाय |
अब मोहिं भूषन, अशन, वसन कछु, सपनेहुँ नाहिं सुहाय |
पुनि पुनि कोउ मूठि सी मारत, मोते सह्यो न जाय |
ज्यों – ज्यों हौं विसरावति त्यों त्यों, अधिक अधिक सुधि आय |
लखि ‘कृपालु’ प्राणाधिक – प्रियतम, प्राणहुँ तजि न सकाय ||

भावार्थ – ( प्यारे श्यामसुन्दर के वियोग में श्री किशोरी जी की दु:खद अवस्था |)
प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना, हाय ! हाय !! मेरे हृदय में बार – बार हूक सी उठ रही है | प्रियतम की मनमोहिनी साँवरी रूप – माधुरी मेरे मन में समा गयी है | अब मुझे वस्त्र, भोजन एवं गहने आदि स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते | बार – बार मानो कोई मूठ – सी मारता है | मुझसे अब यह दु:ख सहा नहीं जाता | मैं जितना ही प्रियतम को भुलाना चाहती हूँ उतना ही उनका और भी अधिक स्मरण होता है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में किशोरी जी कहती हैं कि प्राण से भी अधिक प्यारे श्यामसुन्दर हैं, अतएव उनके मधुर – मिलन की आकांक्षा में मेरे लिए प्राणों को छोड़ना भी असम्भव हो गया है |

( प्रेम रस मदिरा मान - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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