Sunday, August 26, 2012




देहु हरि ! यह झगड़ो निपटाय |
अति ही प्रबल तिहारी दासी, माया शक्ति कहाय |
लख चौरासी योनि नचावति, मोहिं जानि असहाय |
सुतहिँ मार दासी पितु देखत, यह जगहूँ न सुनाय |
पुनि तुम कहँ बिनु हेतु सनेही, वेद पुरानन गाय |
...
बरजि ‘कृपालु’ आपुनी माया, देहु प्रेम रस प्याय ||


भावार्थ - हे श्यामसुन्दर ! यह झगड़ा समाप्त कर दीजिये | यह तुम्हारी दासी,शक्ति,माया अत्यन्त ही प्रबल है | मुझे असहाय समझ कर चौरासी लाख योनियों में भटका रही है | बड़े आश्चर्य की बात है कि जीव पुत्र को तुम्हारी माया दासी मारे और तुम पिता होकर देखो | ऐसा तो संसारी, स्वार्थी पिता भी नहीं करता फिर तुम्हें तो वेद पुराण बिना कारण के ही कृपा करने वाला बताते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे दयामय ! अपनी माया को रोक लो तथा मुझे प्रेम-रस पिला कर निहाल कर दो |


(प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.