Thursday, January 19, 2017

*******श्रीधरी दीदी द्वारा 60 वें जगद्गुरुत्तम-दिवस की शुभकामनायें********
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कृपालु महाप्रभु चरणानुरागी भक्तवृंद !
आप सभी को जगद्गुरुत्तम-दिवस की बहुत -बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के समस्त अनुयायियों के लिए मकर संक्रांति (14 जनवरी ) का ये दिन अत्यंत हर्ष व गौरव का दिन है क्योंकि इसी दिन सन् 1957 में 'काशी-विद्वत्-परिषत्' द्वारा हमारे प्राणप्यारे श्री महाराजजी को न केवल पंचम मूल जगद्गुरु अपितु जगद्गुरुत्तम की उपाधि से विभूषित किया गया था --
"धन्यो मान्य जगद्गुरुत्तम पदैः सोsयम समभ्यर्च्यते"।
किन्तु वास्तविकता तो ये है कि इस पदवी को प्राप्त करके श्री महाराजजी नहीं अपितु श्री महाराजजी जैसे जगद्गुरुत्तम को पाकर ये उपाधि विभूषित हुई है। श्री महाराजजी ने लोककल्याणार्थ इस पदवी को स्वीकार करके जगद्गुरु सिंहासन का, इस उपाधि का , सम्पूर्ण जगत का मान बढ़ाया है। जगद्गुरुत्तम कृपालु जी महाराज को पाकर ये सम्पूर्ण विश्व ही धन्य हुआ है तो फिर उनके शरणागत होने वाले उनके अनुयायियों के विषय में क्या कहा जाये, उनके सौभाग्य का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
जगद्गुरुत्तम हो कर भी वे जितने सरल व सहज रूप में हमें प्राप्त हुये, जिस तरह उन्होंने हम जैसे पतित जीवों को अपनाया , इतना लाड़ लड़ाया, इतनी कृपायें की, उन अकारण-करुणावरुणालय गुरुदेव की अनंत कृपाओं के ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते।
जगद्गुरुत्तम दिवस के रूप में ये सम्पूर्ण विश्व युगों - युगों तक इस दिन श्री महाराजजी की अकारण कृपाओं का स्मरण करके उनकी कीर्तिगाथा गाकर पवित्र होता रहेगा।
हम अधम जीवों के पास वो शब्द कहाँ जो श्री महाराजजी की विरदावली का बखान कर सकें , कृपालु महाप्रभु की कृपायें भी अनंत हैं , गुण भी अनंत , यश भी अनंत उनकी हर चीज़ अनंत है , अनिर्वचनीय है।

इसलिए आइये आज अपने गुरुदेव के चरण-कमलों में बारंबार नमन करते हुए , उनकी कृपाओं का स्मरण करके अश्रु बहाकर उनसे यह प्रार्थना करें --
हे नाथ ! आपने हम जैसे पामर जीवों पर अनंत कृपायें की , अब भी निरंतर कर रहें हैं लेकिन हम कृतघ्नी इस तथ्य से अनभिज्ञ ही हैं। अब ऐसी कृपा कीजिये प्रभु कि हम आपको कृपालु मान लें और निरंतर आपकी कृपाओं का अनुभव करते हुए आपको साथ मानकर ही जीवन व्यतीत करें।
हे कृपासिंधु ! आपका नाम स्वयमेव आपके अलौकिक गुणों की महिमा बखान रहा है। हमारे पास वह शब्द कहाँ जिससे हम आपके उपकारों व गुणों की विरदावली गा सकें।
हे प्रभो ! इतने विशद ज्ञान व भक्ति के माहात्म्य को प्रकाशित करने के साथ हमें इसे पूर्णतया आत्मसात करने की शक्ति प्रदान करने की भी कृपा करें। हम आपके अनंत उपकारों के ऋणी हैं और जन्म-जन्मान्तर तक आपके ऋणी ही रहेंगे।
हे गुरुदेव! आपने 91वें वर्ष पर्यंत अपने शरणागत अनुयायियों को सहज वात्सल्य प्रदान करते हुए , ममतामयी माँ के समान हमारे सब अपराधों को सहते हुए , हमें बरबस भगवत्पथ पर चलाया है हम आपके दयामय अनुग्रह से कभी उऋण न हो सकेंगे।
हे भक्तवत्सल सद्गुरु देव ! हे जगत्वन्द्य जगद्गुरुत्तम ! आपके कलिपावन पाद -पद्मों में समस्त विश्व का कोटि-कोटि प्रणाम !
आपकी सदा जय हो ! जय हो ! जय हो !

________श्रीधरी _______(जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका)।