Thursday, January 19, 2017

60 वें जगद्गुरुत्तम दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

14 जनवरी यानि मकर संक्रांति यानि सूर्य का उत्तरायण यानि प्रकाश की वृद्धि और अंधकार का ह्रास।
पर बात अगर 14 जनवरी 1957 की हो तो यही कहना पड़ेगा कि इस दिन एक ऐसे सूर्य का उत्तरायण हुआ जिसका पुन: कभी दक्षिणायण नहीं होता। जी हाँ! यहाँ पर बात उस सूर्य की होने जा रही है जिसने अपनी अलौकिक सर्वदर्शनसमन्वित तत्त्वज्ञान एवं भक्तिरस की सहश्त्रों किरणों से जीवात्मा के अन्तर्मन को प्रकाशित कर उसके भीतर व्याप्त अनादिकालीन अंधकार को हर लिया। आज भी वह प्रकाश निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। वह सूर्य और कोई नहीं अपितु हम सबके प्रिय श्री महाराज जी अर्थात् जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज है। आज से 60 वर्ष पूर्व जब काशी विद्वत परिषद् द्वारा श्री महाराज जी को न सिर्फ जगद्गुरु अपितु 'जगद्गुरुत्तम' की उपाधि से विभूषित किया जा रहा था तथा सभी विद्वतजन उनको सम्मानित कर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहे थे तो उस समय वास्तव में ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि इस दिव्य अलौकिक भक्तियोगरसावतार 'कृपालु' सूर्य का 'उत्तरायण' न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपने दिव्य तत्त्वज्ञान, भक्तिरस एवं कृपाओं से आलोकित करेगा एवं जीवात्मा के पीड़ित मन की व्यथा को हर लेगा।नि:संदेह यही हुआ, वर्तमान में भी हो रहा है और आगे भी यह क्रम जारी रहेगा।
समस्त साधक समुदाय को 'जगद्गुरुत्तम दिवस' की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ।
बोलिए जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु की जय!!!