Thursday, October 6, 2016

वारी – वारी छवि, वारी नथवारी की |
लखि श्रृंगार लजत श्रृंगारहुँ, छवि – छवि छवि अस प्यारी की |
मणिन – अलंकृत कनक मुकुट पर, लर – मुक्तन मनहारी की |
घूँघर – वारी अति अनियारी, छवि प्यारी लट कारी की |
अम्बर नील गौर – तनु छवि जनु, घन दामिनि अनुहारी की |
झुकि झूमति नासा नथ – बेसर, मुख चूमनि छवि न्यारी की |
कर मेहँदी, पग रची मिहावरि, सिर सेंदुर अरुणारी की |
कनकन कंकन किंकिनि नूपुर, धुनि चूरिन झनकारी की |
छिनहिं मान, मुसकान छिनहिं पुनि, छवि बरसाने – वारी की |
कह ‘कृपालु’ इक चितवनि महँ गति, लखत बनत बनवारी की ||

भावार्थ – नथवारी वृषभानुदुलारी की उस मनोहारी छवि पर मैं वारी – वारी जाता हूँ | किशोरी जी के श्रृंगार को देखकर साक्षात् श्रृंगार भी लज्जित होता है एवं किशोरी जी की छवि को देखकर साक्षात् छवि भी लज्जित होती है | मणि – मण्डित स्वर्ण के मुकुट पर मोतियों की लड़ों का श्रृंगार नितांत मनोहारी है | किशोरी जी की घुँघराली, काली एवं घनी लटें अत्यन्त ही प्यारी हैं | किशोरी जी के गौर शरीर पर नीलाम्बर ऐसा सुशोभित है मानो बादल एवं बिजली का संयोग हो रहा हो | नासिका में पहनी हुई नथ एवं बेसर झुक – झुककर झूमती हुई बार – बार मुख चूम रही है | हाथ में लाल मेहँदी, चरणों में लाल मिहावर, एवं सिर पर लाल सिन्दूर की छवि तो देखते ही बनती हैं | सुवर्ण के कंकण, सुवर्ण की किंकिणी, सुवर्ण के नूपुर एवं चूड़ियों की झनकार बरबस मन को मुग्ध कर लेती है | बरसाने वाली की वह छवि सर्वथा अनुपमेय है, जब वह एक क्षण में तो मान कर लेती हैं तथा दूसरे ही क्षण मुस्कुरा देती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं मुझे तो सबसे बढ़िया छवि श्यामसुन्दर की तब लगती है जब किशोरी जी एक बार घूमकर उन पर कटाक्षपात कर देती हैं |
( प्रेम रस मदिरा रसिया – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति